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    <category>Designing</category>
    <item>
      <title>आर्किटेक्चर के क्षेत्र में करियर के उजले अवसर</title>
      <pubDate>6/9/2010</pubDate>
      <description>&lt;p&gt;ऊँची-ऊँची गगनचुंबी इमारतों, कलात्मक एवं भव्य मंदिरों, मल्टीप्लेक्सो, मालों आदि को देखकर सचमुच आश्चर्य होता है कि आखिर इस निर्माण कार्य को किस तरह से अंजाम दिया गया होगा। दरअसल यह कमाल है एक आर्किटेक्ट का , जिसकी योजनाओं और रणनीति पर अमल कर इस तरह के निर्माण का र्य संपन्न होते हैं। इस हुनर को आर्किटेक्टर के नाम से जाना जाता है या यूँ कहें कि आर्किटेक्टर रचनात्मक कौशल का प्रयोग कर डिजाइनिंग तथा भवन निर्माण की कला का नाम है। सामाजिक, तकनीकी और पर्यावरणीय स्थितियों को ध्यान में रखते हुए इमारतों के निर्माण तथा कला एवं विज्ञान का मिला-जुला रूप ही आर्किटेक्टर कहलाता है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;गौरतलब है कि भवन निर्माण के संबंध में लोगों की व्यावहारिक तथा अन्य आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए आर्किटेक्ट की सेवाएँ लेने का चलन आज का नहीं अपितु सदियों पुराना है। एक आर्किटेक्टर केवल भवनों का खाका ही तैयार नहीं करता है, बल्कि कीमत का निर्धारण कर भवन निर्माण में अपने उम्दा कौशल का प्रदर्शन भी करता है। यह वास्तु व शिल्प का मिला-जुला रूप होता है। मूल अर्थों में आर्किटेक्ट का काम किसी आइडिया को मूर्त रूप देना और कंक्रट के रूप में जमीन पर उतारना है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;किसी आर्किटेक्ट की काबिलियत इस बात पर निर्भर करती है कि वह जगह और साधनों के बेहतर इस्तेमाल में कितना कुशल है। अगर आप किसी संरचना में स्तंभों को पूर्णता प्रदान कर सकने में सक्षम हैं, अगर संरचना को जीवंत बनाने में आपको महारत हासिल है और अगर आप संरचना की खिड़कियों और दरवाजों के माध्यम से अपनी कहानी बयाँ कर सकते हैं तो आर्किटेक्ट के रूप में करियर की असीम ऊँचाइयाँ हाथ फैलाए आपका इंतजार कर रही हैं। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;एक आर्किटेक्टर को विविध कार्य करने पड़ते हैं। उसे निर्माण स्थल का विस्तृत खाका तैयार करना होता है। वास्तविक जीवंत तस्वीर बनाने के लिए अधिक जटिल परियोजनाओं के रेखांकन और थ्री-डी मॉडल भी तैयार करने पड़ते हैं। लाइट फिटिंग, वेन्टीलेशन की व्यवस्था और कभी-कभी भूतल निर्माण, चयनित निर्माण सामग्री, साज-सामान तथा आंतरिक सजावट की योजना के चित्र अलग से तैयार करने पड़ते हैं। आर्किटेक्ट को यह भी खास ध्यान रखना पड़ता है कि उसकी योजना में अग्निशमन नियमों, भवन निर्माण संबंधी का नूनों और अन्य आवश्यक बातों का उल्लंघन न हो। इसके बाद आर्किटेक्ट को विशेषताओं, ऍलोरिंग, फिनिशिंग और निर्माण सामग्री की अनुमानित मात्रा तथा परियोजना की अनुमानित लागत का विवरण तैयार करना पड़ता है। इसके लिए अभियांत्रिकी य सिद्धांतों की समझ, निर्माण विधियों, सामग्री तथा पर्यावरण की तकनीको के नवीनतम विका स संबंधी नियमों की जानकारी का होना भी नितांत आवश्यक है। हालाँकि अत्याधुनिक कम्प्यूटर एडिट सीएडी सॉफ्टवेयर के आ जाने से यह काम अब काफी हद तक आसान हो गया है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;निर्माण उद्योग में उछाल आने वाले दशको तक बरकरार रहने की संभावनाओं के मद्देनजर करियर का यह क्षेत्र का फी दिलचस्प भी है। बारहवीं में गणित, भौतिकी और रसायन विषयों की पढ़ाई के बाद आप आर्किटेक्टर में स्नातक की पढ़ाई कर सकते हैं। अगर स्कूल स्तर पर आपने इंजीनियरिंग ड्राइंग की पढ़ाई की हो तो आगे यह कोर्स का फी आसान हो जाता है। बी. आर्क कोर्स में प्रवेश हेतु प्रवेश परीक्षा उतीर्र्ण करनी होती है । पाँच वर्षीय स्नातक कोर्स बी.आर्क में आर्किटेक्टरल डिजाइन, प्लानिंग, आर्ट एप्रीसिएशन, बिल्डिंग मैनेजमेंट, नेचर एंड एनवॉयरमेंट, मेथड ऑफ कंस्ट्रँशन और हिस्ट्री ऑफ आर्ट एंड आर्किटेक्टर विषय पढ़ाए जाते हैं। आर्किटेक्टर में परा स्नातक कोर्स हेतु बी.आर्क डिग्री आवश्यक है। बी. आर्क के अलावा विभिन्न पोलिटेँनिको में तीन वर्षीय डिप्लोमा पाठ्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं। आर्किटेक्टर के डिप्लोमा पाठ्यक्रम में प्रवेश हेतु गणित विषय के साथ दसवीं कक्षा उतीर्र्ण होना आवश्यक है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;आर्किटेँचर में डिग्री लेने के बाद किसी स्थापित संस्था में इंटर्नशिप की जाती है, ताकि प़ढ़े गए विषय पर कार्य करने का अनुभव प्राप्त् किया जा सके। अगर आर्किटेक्ट चाहें तो अपनी फर्म बनाकर फ्रलांस की तरह काम कर सकते हैं, जिसमें उन्हें प्रति डिजाइन के हिसाब से भुगतान किया जाता है। रचनात्मकता इस क्षेत्र में करियर बनाने के लिए महत्वपूर्ण योग्यता है, जिसके आधार पर आप तरँकी की सीढ़ियाँ तेजी से चढ़ सकते हैं। रोजगार के लिहाज से देखा जाए तो इस क्षेत्र में भविष्य बहुत उज्ज्वल है। वर्तमान समय में आवास ऋण प्रक्रिया के सहज हो जाने के का रण भवन निर्माण प्रक्रिया में बहुत तेजी आई है। जिसके चलते वास्तुकार व आर्किटेँटों की माँग में भी काफी इजाफा हुआ है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;आर्किटेक्ट का कार्यक्षेत्र बहुत व्यापक है। आर्किटेक्टरल फर्म, कंस्ट्रँशन कंपनी, सरकारी विभागों और पुल निर्माण व रखरखाव, विभाग, शहरी व ग्रामीण विकास विभाग और नगर पालिका ओं एवं नगर निगमों में आर्किटेक्ट बहुत ही आकर्षक वेतन व सुविधाओं पर रखे जाते हैं। इसके अलावा आज देश में तीन सौ से ज्यादा इंफ्रास्ट्रँशन डेवलपमेंट कंपनियाँ हैं, जो कई सारे प्रोजेँट पर एक साथ का म करती हैं और जिनके यहाँ हजारों आर्किटेक्ट का म करते हैं। महानगरों में बन रहे ऍलाईओवर, आधुनिक यातायात व्यवस्था मेट्रो, नदी पर बनने वाले पुल और सब-वे के बढ़ते चलन ने आर्किटेक्ट के काम को नया विस्तार दिया है। इसके अलावा भवनों के रखरखाव और सरकारी गृह निर्माण योजनाओं में आर्किटेँट की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है, ताकि जगह के सदुपयोग के साथ आम जनता को उनके पैसे की पूरी कीमत भी मिल सके। इस तरह एक आर्किटेक्ट अपने पेशे के साथ-साथ सच्चे अर्थों में जनता की सेवा भी करता है। इसके अलावा रोड रिसर्च इंस्टीट्यूट में आर्किटेक्ट महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, ताकि यातायात को सही दिशा देने में मदद मिल सके। आर्किटेँट के साथ मिलकर रिसर्चर नए उपकरणों की खोज करते हैं, ताकि का म करने वाले कम परिश्रम में बेहतर का र्य कर सकें। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसके अतिरिक्त इस क्षेत्र के माहिरों की केंद्र व राज्य सरकार के विभागों में भी हमेशा माँग बनी रहती है। आप चाहें तो विभिन्न निर्माण का र्यों से जुडी संस्थाओं और प्राधिकरणों से जुडकर विशेषज्ञ आर्किटेक्ट का काम भी संभाल सकते हैं। काउसिंल ऑफ आर्किटेक्टर इंडिया ने इस क्षेत्र से संबंधित विभिन्न सेवाओं के लिए वेतन और पारिश्रमिक का एक मानक निर्धारत कर रखा है। यह पारिश्रमिक अमूमन परियोजना पर आने वाले खर्च का एक निर्धारित प्रतिशत होता है। सीधे शब्दों में कहें तो इस क्षेत्र में आप प्रारंभिक दौर में भी १५ से २० हजार रुपए मासिक कमा सकते हैं जो प्रसिद्धि मिलने के बाद बढ़ता चला जाता है। &lt;/p&gt;आर्किटेँचर का कोर्स कराने वाले प्रमुख संस्थान इस प्रकार हैं-&lt;p&gt;&lt;ul&gt; &lt;li&gt;देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर। &lt;/li&gt;&lt;li&gt;बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, मेसरा, रांची। &lt;/li&gt;&lt;li&gt;रूड़की इंजीनियरिंग कॉलेज, रूड़की । &lt;/li&gt;&lt;li&gt;गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ आर्किटेक्टर, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ। &lt;/li&gt;&lt;li&gt;दयानंद सागर कॉलेज, ऑफ इंजीनियरिंग, बंगलुरू। &lt;/li&gt;&lt;li&gt;कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग, केरल विश्वविद्यालय, तिरुवनंतपुरम। &lt;/li&gt;&lt;li&gt;इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेँनोलॉजी, खड़गपुर। &lt;/li&gt;&lt;li&gt;स्कूल ऑफ आर्किटेक्टर एंड प्लानिंग, चेन्नई।&lt;/li&gt;&lt;li&gt;सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ इमेजिंग टेक्नोलॉजी, चित्रांजलि हिल्स, थिरूवल्लम, तिरुवनंतपुरम-२७। &lt;/li&gt;&lt;li&gt;जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय, जामिया नगर, दिल्ली। &lt;/li&gt;&lt;ul&gt;&lt;/p&gt;</description>
    </item>
    <item>
      <title>वीडियो एडिटिंग में रोजगार के चमकीले अवसर</title>
      <pubDate>6/9/2010</pubDate>
      <description>&lt;p&gt; ध्यानार्थ- श्री राजीव तिवारी जी-९-१२-२००८ वीडियो एडिटिंग में रोजगार के चमकीले अवसर इलेँट्रॉनिक मीडिया में रोजगार के लिहाज से परदे के सामने की तुलना में परदे के पीछे ज्यादा अवसर होते है। इससे जुडे कई क्षेत्रों में विशेषज्ञता हासिल कर चमकीला कॅरियर बनाया जा सकता है। इन्हीं में से एक रोजगार क्षेत्र है वीडियो एडिटिंग का जिसमें कॅढरियर के ढ़ेरों अवसर उपलब्ध हैं । दर्शक जब वीडियो कार्यक्रम देखता है तो जिन दृश्यों को देखकर प्रभावित एवं रोमांचित होता है वह होता है निर्देशक की प्रतिभा का कमाल, लेकिन इस कमाल को बेमिसाल बनाने में वीडियो एडिटिंग का कमाल सबसे महत्वपूर्ण होता है। किसी भी वीडियो कार्यक्रम में वीडियो एडिटर पोस्ट प्रोडक्शन प्रक्रिया में उल्लेखनीय योगदान देता है। वीडियो एडिटिंग के अंतर्गत किसी न्यूज स्टोरी, डॉँयूमेंट्री, टेलीफिल्म या अन्य कार्यक्रमों के लिए शूट अर्थात पिक्चराइज्ड किए गए फुटेज या लिपिंग से स्क्रिप्ट और स्टोरी की माँग के अनुरूप दृश्य (शॉट्स) काटकर क्रमबद्ध तरीके से व्यवस्थित किए जाते हैं और अनावश्यक दृश्य हटा या डिलीट कर दिए जाते है। इसके अलावा इसमें ऑडियो और विजुअल्स की मैचिंग भी होती है। आवश्यकतानुसार स्पेशल इफेक्टस भी डाले जाते हैं, वॉयस ओवर दी जाती है तथा औयूजिक या च्वॉइस ऑफ औयूजिक डाला जाता है। उसके बाद पैकेजिंग होती है। नई-नई मशीनें और नए-नए सॉफ्टवेयर के आ जाने से फिल्म एडिटिंग का काम बहुत आसान हो गया है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt; गौरतलब है कि वीडियो एडिटिंग दो तरह की होती है- लीनियर एडिटिंग और नॉन लीनियर एडिटिंग। टेप-टू-टेप एडिटिंग को लीनियर एडिटिंग कहते हैं इसके अंतर्गत एक या एक से अधिक टेप (वीडियो कैसेट) के फुटेज से शॉट्स काटकर स्क्रिप्ट या स्टोरी के अनुरूप एक अलग टेप में क्रमबद्ध तरीके से रिकॉर्ड किए जाते हैं जिसे मास्टर कॉपी कहते हैं। इस प्रक्रिया के अंतर्गत एक-एक शॉट को ढूढने के लिए पूरे टेप को बार-बार रिवर्स और फॉवर्ड करना पडत़ा है, जो बहुत ही समय लेने वाला, ऊबाऊ और मेहनत का काम है। साथ ही टेप और फुटेज दोनों जल्दी खराब हो जाते हैं। वर्तमान में नॉन लीनियर एडिटिंग के आ जाने से आज लीनियर एडिटिंग की उपयोगिता बहुत कम रह गई है। एडिटिंग सॉफ्टवेयर की मदद से कम्प्यूटर द्वारा की जाने वाली एडिटिंग नॉन लीनियर एडिटिंग कही जाती है। इसके अंतर्गत शूट (पिक्चराइज्ड) किए गए फुटेज को सॉफ्टवेयर और कैप्चर कार्ड की मदद से डिजिटल फार्म में कम्प्यूटर की हार्ड डिस्क में कैप्चर किया जाता है। फिर स्टोरी या स्क्रिप्ट के अनुसार शॉट्स फारवर्ड का झंझट नहीं होता और सारे शॉट्स कम्प्यूटर स्क्रीन पर कुछ ही सेकंड में उपलब्ध हो जाते हैं जिन्हें सिलेक्त करना और इच्छानुसार क्रम देना बहुत आसान काम होता है। नॉन लीनियर एडिटिंग में स्पेशल इफेक्टस, ग्राफिक्स, औयूजिक, साउंड इफेक्टस आदि भी बहुत आसानी से डाले जा सकते हैं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt; कुछ संस्थानों में बारहवीं के बाद तो कुछ संस्थानों में स्नातक के उपरांत छात्रों को वीडियो एडिटिंग पाठ्यक्रम में दाखिला प्रदान किया जाता है। वीडियो एडिटिंग के प्रमाणपत्र पाठ्यक्रम से लेकर डिग्री पाठ्यक्रम तक संस्थानों में उपलब्ध हैं । इन पाठ्यक्रमों के द्वारा इच्छुक युवा संपादन की बुनियादी अवधारणाओं को समझने लायक बन जाता है। इसके साथ ही साथ एक वीडियो एडिटर के भीतर शैक्षिक योग्यता के अलावा टीम के साथ कार्य करने की रुचि और क्षमता, सामान्य ज्ञान, तकनीकी ज्ञान और कम्प्यूटर तथा सॉफ्टवेयर की जानकारी होनी चाहिए। रचनात्मकता, कल्पनाशीलता, विजुअलाइजेशन की क्षमता, स्क्रिप्ट पर अच्छी पकड़, अच्छी समझ, धैर्य, लगन और कड़ी मेहनत का जज्बा हो तो व्यँति इस क्षेत्र में दिन दूनी, रात चौगुनी तरँकी कर सकता है । चूँकि टीवी चैनल के कार्यक्रम या फिल्में टीम वर्क पर आधारित हैं अत: यहाँ प्रत्येक व्यक्ति महत्वपूर्ण होता है और अपने हिस्से का जरूरी काम करता है, एडिटर भी उसमें से एक है इसलिए उसे अपने काम में पेर्फेक्त होना चाहिए। उसे निर्देशक की आवश्यकता को समझते हुए स्टोरी को फायनल टच देना होता है। इसलिए यदि आपको इस क्षेत्र में दिलचस्पी है तथा आप स्टूडियो में फिल्म निर्माण में महीनों और वर्षों का समय गुजारने की इच्छा रखते हैं तो वीडियो एडिटर के रूप में आप निश्चित ही एक ग्लैमरस कॅरियर का चयन कर सकते हैं। &lt;/p&gt;&lt;p&gt; वर्तमान में हमारे देश में सैकडों टीवी चैनल्स पर हजारों कार्यक्रम प्रतिदिन प्रसारित हो रहे हैं और निरंतर उनकी संख्या में वृद्धि हो रही है। इसलिए भविष्य में इस क्षेत्र में प्रशिक्षित लोगों की माँग बढ़ती ही जाएगी। इसके अलावा टीवी के लिए विभिन्न प्रकार के छोटे-बड़े कार्यक्रम बनाने वाले प्रोडँशन हाउसेज में भी रोजगार के असीमित अवसर हैं। हमारे देश में विश्व का सबसे बड़ा सिनेमा उद्योग है जहाँ विभिन्न भाषाओं में प्रतिवर्ष लगभग ८०० फिल्में बनती हैं। इसी बात से आप अनुमान लगा सकते हैं कि इस क्षेत्र में कितने अवसर उपलब्ध हैं। &lt;/p&gt;&lt;p&gt; वीडियो एडिटर के काम में स्थायित्व है और किसी भी फिल्म या टीवी चैनल में उसकी खासी अहमियत होती है। वीडियो एडिटिंग के क्षेत्र में १० से १५ हजार रुपए प्रतिमाह से शुरूआत करके अपनी क्षमतानुसार जितनी चाहें सेलरी पाई जा सकती है। वीडियो एडिटिंग का कोर्स करने के बाद आप स्वतंत्र निर्माण कंपनियों और मोशन पिँचर्स स्टूडियो में भी काम कर सकते हैं। कुछ वर्षों के अनुभव के बाद इस क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से काम किया जा सकता है अथवा अनुभव के आधार पर पोस्ट प्रोडँशन स्टूडियो, टीवी कंपनियों तथा कार्पोरेट कंपनियों में काम कर सकते हैं। इतना ही नहीं, वेबसाइटों में वीडियो तथा मूवी क्लिपिंग का प्रयोग भी निरंतर बढ़ता जा रहा है, इसीलिए ऑनलाइन वीडियो एडिटर की माँग भी लगातार बढ़ती जा रही है। ऑन लाइन वीडियो क्लिलिप की लोकप्रियता बढ़ने से इंटरनेट के क्षेत्र में भी वीडियो एडिटर्स के अवसर बढ़ते जा रहे हैं। कुछ अच्छे एडिटर आगे चलकर अच्छे निर्देशक भी साबित हुए हैं। &lt;/p&gt;वीडियो एडिटिंग का प्रशिक्षण देने वाले देश के प्रमुख संस्थान इस प्रकार है- &lt;p&gt; &lt;ul&gt; &lt;li&gt;फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, लॉ कॉलेज रोड, पुणे।&lt;/li&gt; &lt;li&gt;सत्यजीत रेफिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट, ईएम बाइपास रोड, पोस्ट ऑफिस, पाँच आसायार, कोलकाता।&lt;/li&gt; &lt;li&gt;फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ तमिलनाडु, सीआईटी कैंपस , चेन्नई-१३१।&lt;/li&gt; &lt;li&gt;एशियन एकेडमी ऑफ फिल्म एंड टेलीविजन, मरवाह, मारवाह स्टूडियो कॉम्प्लेक्स , एफसी १४-१५, फिल्म सिटी, सेँटर-१६ ए, नोएडा।&lt;/li&gt; &lt;li&gt;बिहार इंस्टीट्यूट ऑफ फिल्म एंड टेलीविजन ऑफ पटना, बिहार।&lt;/li&gt; &lt;li&gt;सेंटर फॉर रिसर्च इन आर्ट ऑढ फिल्म एंड टीवी, सेँटर २५, रोहिणी इंस्टीट्यूशनल एरिया, रोहिणी, दिल्ली।&lt;/li&gt; &lt;li&gt;एडिट वँर्स स्कूल ऑफ मास कम्युनिकेशन , इंस्टीट्यूशनल एरिया, सेँटर-६२, नोएडा।&lt;/li&gt; &lt;li&gt;इंटरनेशनल स्कूल ऑफ मीडिया एंड इंटरटेनमेंट स्टडीज, फिल्म सिटी, नोएडा।&lt;/li&gt; &lt;li&gt;सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ इमेजिंग टेँनोलॉजी, चित्रांजलि हिल्स, थिरूवल्लम, तिरुवनंतपुरम-२७। &lt;/li&gt; &lt;li&gt;सेंट जेवियर्स कॉलेज, मुंबई।&lt;/li&gt; &lt;/ul&gt; &lt;/p&gt;</description>
    </item>
    <item>
      <title>इंटीरियर डिजाइनिंग के क्षेत्र में करियर के उजले अवसर</title>
      <pubDate>6/9/2010</pubDate>
      <description>&lt;b&gt;इंटीरियर डिजाइनिंग के क्षेत्र में करियर के उजले अवसर&lt;/b&gt;&lt;p&gt;इंटीरियर डिजाइनिंग के अंतर्गत स्थान की प्लानिंग की जाती है तथा अंदरुनी जगह की सजावट की जाती है चाहे फिर वह घर हो, दफ्तर, होटल, सरकारी भवन या शोरूम जैसे वाणिज्यिक संस्थान हों। इंटीरियर डिजाइनिंग के अंतर्गत योजना, डिजाइन, निर्माण, पुनर्निर्माण, पुनरुद्धार और सज्जा सभी कुछ शामिल है। किसी भी स्थान की इंटीरियर डिजाइनिंग का मुख्य उद्देश्य कार्यक्षमता निर्मित करना तथा सही बजट में सही वातावरण तैयार करना होता है। इंटीरियर डिजाइनिंग का कार्य करने वाले को इंटीरियर डिजाइनर कहते हैं। इंटीरियर डिजाइनर जहाँ एक ओर किसी स्थान की साज-सज्जा करता है, उसे सुंदर बनाता है, ऐसेसरीज जोडता है वहीं दूसरी ओर वाल्यूम का ध्यान रखकर जगह प्लान करता है, इसके पश्चात उस स्थान का उपयोग करने वाले लोगों की संख्या समझता है और फिर आगे की कार्यवाही करता है। करियर के लिहाज से वर्तमान में इंटीरियर डिजाइनिंग के विशेषज्ञों की बाजार में भारी माँग बनी हुई है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गौरतलब है कि जैसे-जैसे देश में वैश्वीकरण की हवाएँ बढ़ती जा रही हैं और पश्चिमी संस्कृति का प्रभाव बढ़ रहा है, वैसे-वैसे इंटीरियर डिजाइनिंग का महत्व बढ़ता जा रहा है। इसके अलावा बहुराष्ट्रीय कंपनियों के देश में आने से कार्यालयों का लुक पूरी तरह से बदल गया है। ये कंपनियाँ अपने दफ्तरों की आंतरिक साज-सज्जा को बहुत महत्व देती हैं। ये कंपनियाँ इंटीरियर डिजाइनिंग के माध्यम से अपने का म के अनुरूप अपनी कंपनी को लुक देने को महत्व देती हैं। इनकी देखादेखी भारतीय का र्पोरेट कंपनियाँ भी इसी ट्रेंड पर चल रही हैं। ग्लोबल विजन होने की वजह से लोगों में वर्क प्लेस के साथ पर्सनल प्लेस को भी खूबसूरत बनाने की होड मची हुई है। इन तमाम बातों के चलते इंटीरियर डिजाइनिंग का व्यवसाय आजकल बहुत माँग वाला हो चला है। फ्रीलांसिंग कंसल्टेंसी का काम होने की वजह से इस क्षेत्र में का म का दायरा बहुत विस्तृत हो जाता है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;ज्यादातर इंटीरियर डिजाइनर किसी न किसी विशिष्ट क्षेत्र के विशेषज्ञ होते हैं जैसे कुछ अपनी विशेषज्ञता बिजनेस डिजाइन में प्रदर्शित करते हैं तो कुछ किसी विशेष कक्ष जैसे ड्राइंगरूम, बेडरूम, किचन, किड्स रूम या बाथरूम की डिजाइन के उस्ताद होते हैं। ग्राहको की रुचि, बजट तथा आवश्यकताओं को दृष्टि में रखते हुए इंटीरियर डिजाइनर आंतरिक निर्माण की ड्राइंग और विशिष्टताएँ तैयार करता है। इसमें दीवारों, फर्शों, छतों की पसंद तथा सज्जा, फर्नीचर और अन्य अंदरूनी सामग्रियों की जमावट, विंडो ट्रीटमेंट, लाइटिंग, विजुअल और साउंड इफेक्त्स पर नियंत्रण आदि शामिल हैं। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;इंटीरियर डिजाइनर बनने हेतु कलात्मकता, प्रबंधकीय कला एवं तकनीकी पारस्परिकता का मेल होना बहुत जरूरी है, क्योंकि इंटीरियर डिजाइनर को अपने विचारों तथा आवश्यकताओं से ग्राहको को अवगत कराना होता है साथ ही बिल्डर्स, प्लंबर्स और इलेक्ट्रिशियन आदि से भी सामंजस्य स्थापित करना पडत़ा है। उन्हें शिल्प की आधुनिक और पुरानी शैलियों, कम्प्यूटर एडेड डिजाइन कौशल, कला संबंधी कार्यों, भवन सामग्रियों तथा अधोसंरचनाओं, लाइटनिंग और टेसचर का उच्च स्तरीय ज्ञान होना चाहिए। इंटीरियर डिजाइनर को बजट का आकलन करने के लिए डिजाइन की लागत निकालना आना चाहिए। उनका विजन अच्छा एवं रंगों की अच्छी परख होनी चाहिए, उसके अलावा उन्हे ग्राहको का आत्मविश्वास बढ़ाने और कई बार आलोचना सुनने में सक्षम भी होना चाहिए। यह ध्यान रखने योग्य बात है कि पेशेवर इंटीरियर डिजाइनर का भविष्य उसके द्वारा अपने ग्राहक को संतुष्ट करने की क्षमता पर ही निर्भर करता है। उसे ग्राहक की आवश्यकताओं का आकलन, मिनिएचर डिजाइन विकसित करने, ग्राहको की प्रतिक्रिया ग्रहण करने, अंतिम डिजाइन विकसित और प्रस्तुत करने, फर्नीशिंग और फिशर मटेरियल का चयन करने तथा अंतिम उत्पाद का सुपरविजन और कार्यान्वयन करते आना चाहिए। इंटीरियर के लिए इस्तेमाल होने वाले प्रत्येक मटेरियल का ज्ञान होना एक डिजाइनर के लिए अतिआवश्यक है। वह उत्पादों के भौतिक एवं रासायनिक गुण जानकर सही जगह, सही अनुपात में उन्हे इस्तेमाल करता है। इससे वह स्थल इकोनॉमिकल होने के साथ ही साथ सुंदर भी बन जाता है। एक डिजाइनर प्रत्येक काम प्रेँटिकल और फंक्शनल करता है इसलिए उसके छोटे से छोटे काम में भी गहरा अर्थ छुपा होता है। रंगों का उपयोग करते समय भी वह कलर सायकोलॉजी पर ध्यान केंद्रित करता है। वह स्थान, व्यँति, उपयोग वातावरण, पेशा जैसे तत्वों को ध्यान में रखकर सर्वश्रेष्ठ रंगों का चयन करता है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिन युवाओं में घर तथा ऑफिस डिजाइन और डेकोर करने की ललक है, उन सृजनशील युवाओं के लिए इंटीरियर डिजाइनिंग एक बहुत ही अच्छा करियर विकल्प है। एक अच्छा और सफल इंटीरियर डिजाइनर बनने के लिए आपको कई कौशल आने चाहिए इनमें से कुछ कौशल या कलाएँ अंतर्निहित होती हैं, तो कुछ कौशल पढ़ाई और प्रशिक्षण द्वारा प्राप्त् किए जा सकते हैं। इनमें से कुछ कौशल ऐसे हैं, जो आपके व्यक्तित्व में होने चाहिए, वे हैं- उत्कृष्ट डिजाइन बोध, गहन पर्यवेक्षण, सूक्ष्म दृष्टि, अच्छी टीम निर्माण क्षमता, अच्छा समन्वयन ज्ञान, समय प्रबंधन का अच्छा कौशल तथा धैर्य। आज भी प्रतिस्पर्धा और लगातार विकसित होती प्रौद्योगिकी को देखते हुए इंटीरियर डिजाइनिंग के क्षेत्र में कुछ बुनियादी ज्ञान और निर्देशों की जानकारी अपेक्षित है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;इंटीरियर डिजाइनिंग के विभिन्न कोर्सों में प्रवेश हेतु न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता बारहवीं कक्षा उतीर्र्ण होना आवश्यक है। इंटीरियर डिजाइनिंग में करियर बनाने के लिए आर्किटेँकचर में पाँच वर्षीय डिग्री कोर्स सबसे बेहतर विकल्प है। विज्ञान समूह से बारहवीं उतीर्र्णछात्र इंटीरियर डिजाइनिंग के डिग्री पाठ्यक्रमों में प्रवेश ले सकते हैं। इसके अलावा किसी भी विषय में बारहवीं करने वाले छात्र इंटीरियर डिजाइनिंग में १ से २ वर्ष का डिप्लोमा कोर्स भी कर सकते हैं। इसमें से कई पाठ्यक्रमों में प्रैक्टिकल कार्यों द्वारा आवश्यक कार्य अनुभव प्रदान किया जाता है। अधिकढांश शहरों के पॉलीटेकनीक और वोकेशनल ट्रेनिंग स्कूलों में इस तरह के कोर्स संचालित किए जाते हैं। जिस तरह से इन दिनों रीयर एस्टेट, प्रापर्टी और बिल्डिंग कंस्ट्रँशन का जबर्दस्त दौर चल रहा है, इसे देखते हुए इंटीरियर डिजाइनरों के लिए बहुत संभावनाएँ हैं। वे चाहे तो स्थापित इंटीरियर डिजाइनर संस्थान, आर्किटेक्तट फर्म या कंसल्टेसी फर्मों या बिल्डर और कॉन्ट्रेक्टर के साथ का म कर सकते हैं। वे बड़ी होटलों, हॉस्पिटलों, शॉपिंग मॉल या डिजाइन स्टूडियो और फर्नीचर स्टोर्स में डिजाइन कंसल्टेंट के रूप में भी का र्य कर सकते हैं। इंटीरियर डिजाइनर थिएटरों में सेट डिजाइनर का दायित्व निभा सकते हैं या ड्रामा प्रोडक्शन और औयुजिकल शो में सेट बना सकते हैं। टीवी शो में भी इनकी खासी माँग है। नई संरचनाओं के अलावा इंटीरियर डिजाइनर्स मौजूदा संरचनाओं के नवीनीकरण, विस्तार या पुनरुद्वार का का म कर सकते हैं। साथ ही खुद अपनी फर्म स्थापित कर न्यूनतम निवेश कर अच्छी आय अर्जित कर सकते हैं। इंटीरियर डिजाइनर्स की आय उनके डिजाइनिंग का र्य पर निर्भर करती है। फिर भी शुरुआती वेतन ८ से १० हजार रुपए मासिक होता है जो अनुभव बढ़ने के साथ-साथ बढ़कर ७५ से एक लाख रुपए मासिक तक हो सकता है। स्वयं का व्यवसाय करने वालों के लिए आय की कोई सीमा नहीं है। &lt;/p&gt;इंटीरियर डिजाइनिंग एवं इंटीरियर डेकोरेशन का कोर्स कराने वाले प्रमुख संस्थान इस प्रकार हैं- &lt;p&gt;&lt;ul&gt;&lt;li&gt;नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ डिजाइन, पालडी, अहमदाबाद।&lt;/li&gt;&lt;li&gt;द स्कूल ऑफ इंटीरियर डिजाइन, यूनिवर्सिटी रोड, अहमदाबाद। &lt;/li&gt;&lt;li&gt;एपीजे इंस्टिट्यूट ऑफ डिजाइन, ५४९, तुगलका बाद इंस्टिट्यूशनल एरिया, महरौली, बदरपुर रोड, नई दिल्ली। &lt;/li&gt;&lt;li&gt;जे. जे. स्कूल ऑफ आर्ट्स, डॉ. डीएन रोड, फोर्ट, मुंबई। &lt;/li&gt;&lt;li&gt;नेशनल स्कूल ऑफ फैशन डिजाइन, एनआईएफडी कैऔपस, २-बी, मध्य मार्ग, सेँटर-२७, चंडीगढ़। &lt;/li&gt;&lt;li&gt;एसएनडीटी वूमन यूनिवर्सिटी, नाथीबाई ठाकरसे रोड, मुंबई। &lt;/li&gt;&lt;li&gt;आर्च इंस्टिट्यूट ऑफ फैशन एंड डिजाइन, प्लांट नं.-९, मालवीय नगर इंस्टीट््यूशनल एरिया, मालवीय नगर, जयपुर।&lt;/li&gt;&lt;li&gt;सोफिया कॉलेज, बी.के. सोमानी पोलीटेँनिक भूलाभाई देसाई रोड, मुंबई।&lt;/li&gt;&lt;li&gt;स्कूल ऑफ इंटीरियर डिजाइन एंड इंस्टिट्यूट ऑफ एनवायरमेंटल डिजाइन, वल्लभ विद्यानगर, गुजरात। &lt;/li&gt;&lt;li&gt;डिपार्टमेंट ऑफ एडल्ट एजुकेशन, देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर। &lt;/li&gt;&lt;li&gt;डिजाइन इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया, इंदौर। &lt;/li&gt;&lt;li&gt;डिजाइन इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया, इंदौर। &lt;/li&gt;आईएनआईएफडी, इंदौर। &lt;/ul&gt;&lt;/p&gt;</description>
    </item>
    <item>
      <title>रेडियो जॉकी (आरजे) के रूप में कॅरियर के उजले अवसर</title>
      <pubDate>6/9/2010</pubDate>
      <description>&lt;p&gt;वर्तमान दौर में मनोरंजन का व्यवसाय बहुत तेज गति से प्रगति कर रहा है। मनोरंजन की इसी बढ़ती माँग के कारण देश ही नहीं मध्यप्रदेश जैसे विकासशील प्रदेश के शहरों एवं कस्बों में एफएम (फ्रिक्वेंसी माड्युलेशन) रेडियो स्टेशनों की बाढ़-सी आ गई है। इन रेडियो स्टेशनों पर अलग-अगल कार्यक्रमों के तहत चौबीस घंटे नए-पुराने गाने बजते रहते हैं। लेकिन हर कार्यक्रम का अपना एक अलग ही अंदाज होता है। उस कार्यक्रम को पेश करने वाले रेडियो जॉकी यानी आरजे कहलाते हैं। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;रेडियो जॉकी एक ऐसा क्षेत्र है, जिसमें नाम,शोहरत और पैसा तीनों भरपूर हैं। यहाँ मौज मस्ती और ग्लैमर के साथ-साथ नाम रोशन करने का पूरा मौका मिलता है। इस क्षेत्र में मधुर आवाज और क्रिएटिव दिमाग रखने वालों की दरकार होती है। विश्व के पहले एफएम रेडियो स्टेशन डबल्यू. वन एँस. ओजे की शुरुआत अमेरिकी में हुई। साफ आवाज, अच्छा प्रसारण और सुलभ सेवा की वजह से यह लोकप्रिय होता चला गया। भारत में एफएम क्रांति की शुरुआत नऒबे के दशक में हुई। आरंभ में तो इसका प्रसारण चार महानगरों तक ही सीमित रहा परंतु वर्तमान में देश के सभी प्रमुख शहरों तथा कस्बों में निजी एफएम रेडियो स्टेशनों को अनुमति प्रदान कर दी गई है। एक साथ कई एफएम रेडियो स्टेशन शुरू होने की घोषणा के साथ ही इस पेशे का ग्लैमर आसमान छूने लगा है। रेडियो मिर्ची, माय एफएम, रेड एफएम, बिग एफएम, रेडियो सिटी आदि ढेरों एफएम रेडियो स्टेशनों के खुलने से रोजगार के असीमित अवसर पैदा हो रहे हैं। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस पेशे की खासियत आवाज का वह जादू है, जो लोगों को दीवाना बना देता है। आरजे यानी रेडियो जॉकी का दायित्व सीधे-सीधे श्रोताओं से तारतय बैठाने का होता है। यही व्यक्ति सीधे तौर पर श्रोताओं से मुखाबित होता है इसलिए इसे कार्यक्रम को खूबसूरत ढंग से प्रस्तुत करने का सलीका आना चाहिए। इस पद के लिए भी किसी विशेष या अनिवार्य शैक्षणिक योग्यता की दरकार नहीं होती है। सामान्य अंग्रेजी व हिन्दी भाषा का ज्ञान, मधुर आवाज व स्पष्ट उच्चारण इस पद के लिए प्राथमिक या आवश्यक गुण हैं क्यों कि इन्हीं के जरिए रेडियो जॉकी श्रोताओं को किसी कार्यक्रम से बाँधे रखता है। संगीत की विभिन्न विधाओं व उसकी शाखाओं की जानकारी व ऑडियो सॉफ्टवेयर का ज्ञान भी उसे होना चाहिए। इसके अतिरिक्त रेडियो स्टेशन की स्थानीय परिस्थितियों एवं वहाँ प्रचलित परंपराओं , नवीन समसामयिक घटनाओं की जानकारी व स्थानीय भाषा का ज्ञान होना अच्छे रेडियो जॉकी के लिए बहुत जरूरी है। आजकल ऐसे कार्यक्रमों का काफी प्रचलन है जिसमें उसे श्रोताओं से सीधे-सीधे बातचीत करनी होती है। कई बार तो प्रोग्राम लाइव होते हैं इसलिए किसी भी रेडियो जॉकी में प्रत्युत्पन्नमति या क्विक रिस्पांस क्षमता का होना भी जरुरी है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;रेडियो जॉकी में अच्छा सेंस ऑफ ह्यूमर भी बहुत मायने रखता है क्यों कि इसके द्वारा वह गंभीर होते माहौल को हल्का -फुल्का बना देता है। रेडियो जॉकी का सबसे महत्वपूर्ण गुण है उसकी आवाज का प्रस्तुतीकरण। शईंदो के अनुरूप अपनी आवाज में उतार-चढ़ाव पैदा करने की कला और रोचक ढंग से बोलने का गुण भी उसमें होना चाहिए। जो नियमित रूप से एफएम रेडियो सुनते है, वे जानते है कि हर एक रेडियो जॉकी की अपनी एक अलग स्टाइल होती है। इसलिए यदि बोलने की अलग स्टाइल डेवलप की जाए तो आप भीड में भी अलग दिखेंगे। एक ही शैली में बोलते रहेगे तो श्रोता बोर हो जाएँगे इसलिए आवाजें बदलकर बोलने की कला भी आपको आनी चाहिए इससे आपको श्रोताओं का ज्यादा प्रतिसाद मिलेगा। पूरे प्रोग्राम की स्क्रिप्ट हो यह संभव नहीं इसलिए खुद अपने तरीके से लाइव कार्यक्रम का संचालन आना नितांत जरूरी है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;एक रेडियो जॉकी बनने के लिए कोई विशेष शैक्षणिक योग्यता अनिवार्य नहीं है। १२वीं पास कोई भी युवा इस क्षेत्र में अपनी किस्मत आजमा सकता है । हालांकि सरकारी रेडियो प्रसारण केंद्रों पर एक रेडियो जॉकी के लिए स्नातक होना अनिवार्य है और उसकी आयु ३५ वर्ष से अधिक नहीं होनी चाहिए लेकिन प्रायवेट एफएम रेडियो स्टेशनों के लिए योग्यता और उम्र की ऐसी कोई पाबंदी नहीं है। हॉं, उसे अपने फन में माहिर होना बहुत जरूरी है। एक रेडियो जॉकी के लिए शईंदो का उच्चारण बहुत महत्वपूर्ण होता है। उसे सरल शईंदो के साथ-साथ कठिन शईंदो के भी शुद्ध और स्पष्ट उच्चारण में महारत हासिल होनी चाहिए। इसके अलावा सामान्य ज्ञान की जानकारी और धाराप्रवाह बोलने की कला में भी उसे निपुण होना अनिवार्य है। चूँकि एक रेडियो जॉकी श्रोताओं से सीधे मुखातिब होता है, इसीलिए उसे हमेशा इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उसे अपनी बातचीत से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करना है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;एफएम चैनलों की संख्या लगातार बढ़ते जाने से रेडियो जॉकी की कमाई में पहले की तुलना में काफी इजाफा हुआ है। सरकारी रेडियो स्टेशनों में एक रेडियो जॉकी के रूप में स्थायी रूप से अनुबंध होने पर वेतन के रूप में शुरुआत में १० से १५ हजार रुपए तक मिलते है। प्राइवेट चैनलों में एक कुशल रेडियो जॉकी की शुरुआत १५ से २५ हजार रुपए से हो सकती है जो अनुभव के साथ बढ़ती जाती है। रेडियो जॉकी के रूप में वॉयस ओवर, एडवरटाइजमेंट जिंगल्स के तौर पर टेलीविजन चैनल और कार्पोरेट घराने के लिए प्रोग्राम पेश करके भी अच्छा खासा धन कमाया जा सकता है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;देश में रेडियो जॉकी प्रशिक्षण पाठ्यक्रम मुहैया कराने वाले संस्थान कम ही हैं। हालांकि ब्राडकास्टिंग पाठ्यक्रम चलाने वाले संस्थानों की कमी नहीं है, लेकिन रेडियो जॉकी का विशेष प्रशिक्षण कम ही संस्थान देते हैं। जिन संस्थानों में इस तरह के पाठ्यक्रम चल रहे हैं, वहाँ एक सप्तह के सर्टिफिकेट कोर्स से लेकर एक साल तक के पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा कोर्स उप्लब्ध् हैं । इसके अलावा अल्प अवधि के क्रैश कोर्स भी उम्मीदवारों के लिए काफी उपयोगी होते हैं, जिसे करने के बाद इस क्षेत्र में पदार्पण किया जा सकता है। इस तरह की शिक्षा हासिल करते समय एक बात का विशेष ध्यान रखें कि प्रशिक्षण संस्थान में सिर्फ दाखिला मिल जाने या डिग्री हासिल कर लेने भर से रेडियो जॉकी नहीं बना जा सकता है। निरंतर अभ्यास और अनुभव से ही इस क्षेत्र में नाम और दाम कमाया जा सकता है। रेडियो जॉकी का प्रशिक्षण पाठ्यक्रम संचालित करने वाले प्रमुख संस्थान एवं प्रमुख पाठ्यक्रम इस प्रकार हैं-&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;ul&gt; &lt;li&gt;ऑफ इंडिया रेडियो, चंडीगढ़ में एक सप्तह का वाणी सर्टिफिकेट कोर्स उप्लब्ध् है। &lt;/li&gt; &lt;li&gt;मुद्रा इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, अहमदाबाद में एक वर्ष का डिप्लोमा पाठ्यक्रम उप्लब्ध् है। &lt;/li&gt;&lt;li&gt;जेवियर इंस्टीट्यूट ऑफ ब्रॉडकास्टिंग, मुंबई में अनाउंसिंग, ब्रॉडकास्टिंग और डबिंग का एकवर्षीय पाठ्यक्रम उप्लब्ध् है। &lt;/li&gt; &lt;li&gt;इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में एक वर्ष का रेडियो प्रसारण में स्नातकोत्तर डिप्लोमा पाठ्यक्रम उप्लब्ध् है। &lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;/p&gt;</description>
    </item>
    <item>
      <title>कम्प्यूटर ग्राफिक्स और एनिमेशन के क्षेत्र में कॅरियर के उजले अवसर</title>
      <pubDate>6/9/2010</pubDate>
      <description> &lt;p&gt; वर्तमान समय में प्रिंट मीडिया, इलेँट्रॉनिकढ मीडिया, कम्प्यूटर एवं आईटी सेँटर, फिल्म जगत तथा विज्ञान के क्षेत्र में कम्प्यूटर ग्राफिक्स और एनिमेशन चमकते हुए कॅरियर विकल्प के रूप में दिखाई दे रहे हैं। फिल्म जगत में तो आज कम्प्यूटर ग्राफिक्स और एनिमेशन का ही बोलबाला है। 'हनुमान`, 'कोई मिल गया` तथा 'हैरी पॉटर` जैसी फिल्मों की अपार सफलता में कम्प्यूटर ग्राफिक्स एवं एनिमेशन का बहुत बड़ा हाथ है। कम्प्यूटर ग्राफिक्स के द्वारा बनाई गई एनिमेशन फिल्में अब केवल बच्चों तक ही सीमित नहीं हैं। इस माध्यम ने अपने को मुंख्य धारा के सिनेमा, विज्ञापन, टेलीविजन और वीडियो गेम तथा गेमिंग उद्योग में भी स्थापित कर लिया है। आज संपूर्ण विश्व में कम्प्यूटर ग्राफिक्स एवं एनिमेशन की धूम मची हुई है। इस समय देश में मोटे तौर पर १०,००० प्रशिक्षित कम्प्यूटर ग्राफिक्स डिजाइनर ए वं एनिमेटर कार्यरत हैं, जबकि माँग कदम से कदम ५०,००० कम्प्यूटर ग्राफिक्स डिजाइनर ए वं एनिमेटरों की है। इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि कम्प्यूटर ग्राफिक्स और एनिमेशन के क्षेत्र में रोजगार के कितने चमकीले अवसर हैं । &lt;/p&gt; &lt;p&gt; कम्प्यूटर ग्राफिक्स एवं एनिमेशन की प्रक्रिया स्टोरी बोर्ड तैयार करने के साथ शुरू होती है, जो एनिमेशन श्रृंखला के लिए विजुअल स्क्रिप्ट प्रदान करता है। इसके बाद वास्तविक वस्तुओं को ऑप्टिकल स्केनिंग के द्वारा ऐनिमेटिड ग्राफिक्स में परिवर्तित किया जाता है और उन्हें डिजिटल रूप में बदला जाता है । अगला कदम स्क्रिटिंग मूवमेंट कंट्रोल से संबद्ध है, जिसके अंतर्गत स्थिर चित्रों को चलचित्रों जैसा होने का भ्रम पैदा करने के उपाय किए जाते हैं । आखिर में प्रकाश, संरचना, परछाई, रंग, पारदर्शिता का प्रयोग करके किसी वस्तु या व्यक्ति को सजीव व्यवहार करते दिखाया जाता है । कम्प्यूटर ग्राफिक्स एवं एनिमेशन तकनीक में बड़ी संख्या में कर्मिकों की आवश्यकता पड़ती है । मामूली पाँच मिनट की कम्प्यूटर ग्राफिक्स एवं एनिमेशन फिल्म तैयार करने के लिए दो हफ्ते तक करीब ५०-६० लोगों की टीम को काम करना पड़ता है । प्रति सैकंड २४ फ्रेम की औसत से एक फिल्म में ५० हजार से अधिक अलग-अलग ड्राइंगों का इस्तेमाल करना पड़ता है तब जाकर एक ५ मिनट की एनिमेटेड फिल्म बनती है । &lt;/p&gt; &lt;p&gt; कम्प्यूटर ग्राफिक्स एवं एनिमेशन डिजाइनर बनने के लिए आपमें उत्कृष्ट रचनात्मक और कलात्मक क्षमताएँ होनी चाहिए। ड्राइंग, स्केचिंग अथवा व्यंग्य चित्रण में अभिरुचि के साथ विनोदी स्वभाव और बेमेल या असंगत चीजों को पहचानने की प्रखर शक्ति इस क्षेत्र में सफलता में सहायक सिद्ध हो सकती है। इस तरह आपमें टीम के रूप में काम करने का गुण भी होना चाहिए । कम्प्यूटर ग्राफिक्स एवं एनिमेशन की विधा को कक्षा दसवीं या बारहवीं के बाद एक पूर्ण कॅरियर के रूप में अपनाया जा सकता है । अच्छे कॅरियर के लिए जरूरी है कि आप कदम से कदम बारहवीं कक्षा तक पढ़ाई करें और उसके बाद अपनी रुचि के अनुरूप फइन आट्र्स/कमर्शियल आर्ट, मल्टीमीडिया या कार्टूनिंग में डिप्लोमा करें । कृमिक आकृतियों के रेखांकढन के लिए किसी औपचारिक प्रशिक्षण की विशेष आवश्यकता नहीं होती । आपके पास रेखांकन, ड्रॉ करने या किसी भी बात को काल्पनिक और व्यंग्यात्मक रूप में चित्रित करने की प्रतिभा व क्षमता होनी चाहिए । यदि आप इन गुणों के धनी हैं तो एक कम्प्यूटर ग्राफिक्स डिजाइनर एवं एनिमेटर के रूप में आपकी सफलता सुनिश्चित है । आदर्श स्थिति होगी कि अगर आपमें यह प्रतिभा है तो आप इसके साथ ही कम्प्यूटर मल्टीमीडिया में प्रशिक्षित हो जाएँ । अगर आप ऐसा कर लेते हैं तो फिल्म/इलेँट्रॉनिक मीडिया या प्रिंट मीडिया में कम्प्यूटर ग्राफिक्स डिजाइनर एवं एनिमेशन आर्टिस्ट के रूप में आपको कई क्षेत्रों में हाथ दिखाने का मौका मिलता है। अगर आप मल्टीमीडिया कोर्स करते हैं तो यह आपको तकनीकी पक्षों को समझने में मदद करेगा और आप विभिन्न तरह के सॉऍटवेयर में काम कर सकते हैं। अगर आप इन क्षेत्रों में काम करना चाहते हैं और कला में आपकी रुचि है तो आप एडोब फटोशॉप, एडोब इमेज रेडी,डायरेँटर-७, एनिमेटर प्रो. एनिमेटर स्टूडियो जैसे पैकेज सीख सकते हैं। इनके अलावा ग्राफिक डिजाइनिंग, एनिमेशन डिजाइनिंग, विजुअल कम्युनिकेशन एवं एप्लाइड आर्ट का प्रशिक्षण भी आप प्राप्त कर सकते हैं। &lt;/p&gt; &lt;p&gt; ऐनिमेटरों के लिए वर्तमान में कॅरियर के काफ उजले अवसर उपलब्ध हैं बशर्ते आपमें प्रतिभा हो, आप कल्पनाशील हों और मौलिक काम करने की क्षमता हो । आपको फिल्मों, प्रकाशन समूहों, पत्रिकाओं, अखबारों, विज्ञापन एजेंसियों एवं ऑडियो- विजुअल मीडिया में अच्छे अवसर मिल सकते हैं । टीवी कार्टूनिंग एक बहुत ही उभरता क्षेत्र है और इंटरनेट ने तो कम्प्यूटर ग्राफिक्स डिजाइनर एवं एनिमेटरों के लिए कई अवसर पैदा कर दिए हैं । एक अच्छा कम्प्यूटर ग्राफिक्स डिजाइनर एवं एनिमेटर कभी भी बेरोजगार नहीं बैठ सकता है। इस क्षेत्र में कॅरियर बनाने हेतु अच्छे प्रशिक्षण संस्थान से प्रशिक्षित होना आवश्यक है । कम्प्यूटर ग्राफिक्स डिजाइनिंग एवं एनिमेशन प्रशिक्षण से जु़डे प्रमुख संस्थान इस प्रकार हैं- &lt;/p&gt; &lt;ul&gt; &lt;li&gt;मध्यप्रदेश के विभिन्न शहरों में स्थिति एरिना मल्टीमीडिया में एनिमेशन ए वं कम्प्यूटर ग्राफिक्स से जु़डे निऔन प्रमुख पाठ्यक्रम उपलब्ध हैं- मल्टीमीडिया स्पेशलिस्ट, मल्टीमीडिया फॉर वेब एंड एनिमेशन सुइट, ऑथरिंग मल्टीमीडिया तथा ग्राफिक सुइट । &lt;/li&gt; &lt;li&gt;माया एकेडमी ऑफ एडवांस्ड सिनेमैटिँस, इंदौर में कम्पोजिंग एंड एडिटिंग (कम्पोजिंग, थ्री-डी एनिमेशन एंड विजुअल इफेक्टस-१, कम्पोजिंग,थ्री-डी एनिमेशन एंड विजुअल इफेक्टस-२) तथा प्रोफेशनल डिप्लोमा इन थ्री-डी एनिमेशन एंड विजुअल इफेक्टस पाठ्यक्रम उपलब्ध हैं। &lt;/li&gt; &lt;li&gt;बिरला इंस्टिट्यूट ऑफ टैँनोलॉजी, मेसरा।&lt;/li&gt; &lt;li&gt;हार्ट एनिमेशन एकेडमी, ७-ए मार्ग संख्या -१२, बंजारा हिल्स, हैदराबाद।&lt;/li&gt; &lt;li&gt;नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन पाल्डी, अहमदाबाद।&lt;/li&gt; &lt;li&gt;सर जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट, मुंबई।&lt;/li&gt; &lt;/ul&gt; </description>
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