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    <category>Engineering</category>
    <item>
      <title>एस्ट्रोनॉमी (अंतरिक्ष विज्ञान) में कॅरियर के चमकीले अवसर</title>
      <pubDate>6/11/2010</pubDate>
      <description>&lt;b&gt;एस्ट्रोनॉमी (अंतरिक्ष विज्ञान) में कॅरियर के चमकीले अवसर&lt;/b&gt;&lt;p&gt;एस्ट्रोनॉमी (अंतरिक्ष विज्ञान) विज्ञान की ही एक शाखा है, जिसके अंतर्गत पृथ्वी से परे करोड़ों ग्रह, उपग्रह, तारे, धूमकेतु, आकाशगंगा एवं अन्य अंतरिक्ष में उपस्थित हेवनली बॉडीज का अध्ययन किया जाता है। इसके अलावा अंतरिक्ष विज्ञान के अंतर्गत उन नियमों एवं प्रभावों का भी अध्ययन किया जाता है, जो इन्हें संचालित करते हैं। अंतरिक्ष विज्ञान में न केवल हेवनली बॉडीज के इतिहास की गर्त में जाकर देखना होता है, बल्कि उनके भविष्य में विकास की संभावनाओं पर भी पैनी नजर रखनी होती है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पृथ्वी किस आकार की है? अगर पृथ्वी घूमती है तो हमारा घर क्यों नहीं घूमता ? सूर्यग्रहण-चंद्रग्रहण क्या होता है? क्या केवल पृथ्वी पर ही जीवन है ? ऐसे ही सैकड़ों सवालों का हल अंतरिक्ष विज्ञान के अंतर्गत ढूं ढा जाता है। अंतरिक्ष विज्ञान में कॅरियर उन हजारों रहस्यों से पर्दा उठाने का अवसर भी होता है, जो अभी तक अनसुलझे हैं। वहीं उनके अज्ञात से ज्ञात तक के सफर से भी रूबरू होते हैं। यह न केवल वैज्ञानिक स्वभाव की परीक्षा होती है, बल्कि आपकी जिज्ञासाएँ भी स्तर दर स्तर शांत होती जाती हैं और साथ ही आप तारों की दुनिया के जानकारों की फेहरिस्त में अपना नाम जोड़ते हैं। इसे अपना कॅरियर चुनने वाले जहाँ देश के बेस्ट ब्रेन केटेगरी में शुमार किए जाते हैं, वहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बुद्धिजीवी के रूप में भी उनकी एक विशिष्ट पहचान बनती है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;वर्तमान समय में आधुनिक तकनीक और नए-नए वैज्ञानिक उपकरणों के विकास ने अंतरिक्ष विज्ञान को अध्ययन की एक विशेष शाखा बना दिया है। हालांकि अंतरिक्ष विज्ञान, विज्ञान के अन्य विषयों जितनी ही पुरानी शाखा है। क्योंकि मानव प्राचीन समय से ही तारों और हेवनली बॉडीज की गति पर नजर बनाए हुए है। विज्ञान और टेक्नोलॉजी के आसमान छू रहे विकास ने चाँद, तारों व ग्रहों को करीब से जानने की सहूलियत प्रदान कर दी है। आर्यभट्ट, भास्कर, गेलीलियो और न्यूटन इस क्षेत्र की कुछ महानतम हस्तियाँ हैं, जो आकाश के चमचमाते तारों से किसी भी प्रकार से कम नहीं हैं। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;एस्ट्रोनॉमी में कॅरियर बनाने के लिए सबसे पहले आपको बी.एससी. की डिग्री लेनी होगी, जहाँ आपके विषयों में फिजिँस एवं मैथ्स भी होना जरूरी है। साइंस से स्नातक होने के बाद आप एस्ट्रोनॉमी थ्योरी या एस्ट्रोनॉमी ऑऒजर्वेशन कोर्स चुन सकते हैं। वहीं मास्टर डिग्री के बाद विशिष्ट कोर्सेज में प्रवेश लिया जा सकता है। यदि आप बारहवीं के बाद इलेक्ट्रिकल / इलेक्ट्रॉनिक्स / इलेक्ट्रिकल कम्युनिकेशन में बैचलर ऑफ इंजीनियरिंग यानी बी.ई. करते हैं तो आप इंस्ट्रूमेंट एस्ट्रोनॉमी या एक्स्पेरिमेंटल एस्ट्रोनॉमी के क्षेत्र में चमकीला कॅरियर बना सकते हैं। इसी दिशा में आगे बढ़ने पर आगे एस्ट्रोनॉमी में पीएच.डी. भी कर सकते हैं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;एस्ट्रोनॉमी के क्षेत्र में देश में केवल मास्टर स्तर व पीएच.डी. प्रोग्राम ही विश्वविद्यालयों में सामान्यत: उपलब्ध हैं। हाँ, एकवर्षीय ज्वाइंट एस्ट्रोनॉमी प्रोग्राम इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस बंगलुरू चलाती है। यह प्रोग्राम इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स, रामन रिसर्च इंस्टीट्यूट और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च, मुंबई के साथ मिलकर चलाया जाता है। कोर्स की समाप्त् के बाद आपको इन्हीं इंस्टीट्यूट में से एक में पीएच.डी. की भी ऑफर दी जाती है। टी.आई.एफ.आर. मुंबई और इंटर यूनिवर्सिटी सेंटर फढॉर एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स, पुणे, ये दोनों ऐसे संस्थान हैं, जहाँ आप कास्मोलॉजी में रिसर्चर के रूप में कॅरियर बना सकते हैं। शुरुआत में आपको २ वर्षीय जूनियर रिसर्च फैलोशिप और बाद में सीनियर रिसर्च फैलोशिप के लिए चुना जाता है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;आकाश में तारों के पैटर्न, उनकी हलचल आदि का अध्ययन करना एक लंबा, बहुत समय लेने वाला एवं पेचीदा काम है, इसलिए धैर्य इस पेशे का पहला व सबसे जरूरी गुण भी है। अगली बेहद जरूरी विशेषता आपका जिज्ञासु होना है। पूरे आत्मविश्वास और उत्साह से रहस्यमयी प्रश्नों के उत्तर तलाशने होते हैं। आपमें साइंटिफिक एप्रोच के अलावा प्रोग्रामिंग स्किल भी बेहतरीन होनी जरूरी है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;एस्ट्रोनॉमी में कोर्स करने के उपरांत आप चाहे तो किसी भी रिसर्च इंस्टीट्यूट में बतौर रिसर्च साइंटिस्ट काम कर सकते हैं। आपको भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में भी रोजगार मिल सकता है। कुछ एक नॉन प्रॉफिट आर्गेनाइजेशन में स्वयं खगोलीय उपकरण बनाने का मौका मिलता है, साथ ही साथ एस्ट्रोनॉमी प्रोजेँट में भी काम करने का अवसर मिलता है। अगर आप घूमने के शौकीन हैं तो आपको देश-विदेश घूमने के बहुत सारे मौके मिलेंगे, क्योंकि सेमिनार व काफ्रेंस आयोजनों में आए दिन विभिन्न स्थानों पर जाना जो होता है। रिसर्च वर्क के दौरान जूनियर रिसर्चर को स्टाइपेंड के तौर पर ८ हजार रुपए मासिक व सीनियर रिसर्चर को ९ हजार रुपए मासिक आसानी से मिल जाते हैं। मेडिकल, ट्रेवल, होटल एकमोडेशन और हाउस रेट आदि भी अलग से दिए जाते हैं। रिसर्च वर्क समाप्ति के बाद रोजगार के अवसर कहीं अधिक बढ़ जाते हैं। बहुत से सरकारी संस्थानों में एस्ट्रोनॉमर की नियुक्ति की जाती है। यहाँ आपको विभिन्न साइंटिस्ट ग्रेड के पद पर रखा जाता है जहाँ आकर्षक वेतन के अतिरिक्त आपको अन्य लाभ भी मिलते हैं। &lt;/p&gt;एस्ट्रोनॉमी (अंतरिक्ष विज्ञान) का कोर्स कराने वाले देश के प्रमुख संस्थान इस प्रकार हैं- &lt;p&gt;&lt;ul&gt; &lt;li&gt;रामन रिसर्च इंस्टीट्यूट, बंगलुरू, कर्नाटक।&lt;/li&gt; &lt;li&gt;इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स, बंगलुरू, कर्नाटक&lt;/li&gt; &lt;li&gt;नेशनल सेंटर फॉर रेडियो एस्ट्रोफिजिक्स, पुणे, महाराष्ट्र।&lt;/li&gt; &lt;li&gt;मदुरै कामराज यूनिवर्सिटी, मदुरै, तमिलनाडु। &lt;/li&gt; &lt;li&gt;पंजाब यूनिवर्सिटी, पटियाला, पंजाब। &lt;/li&gt; &lt;li&gt;महात्मा गाँधी यूनिवर्सिटी, कोट्टयम, केरल । &lt;/li&gt; &lt;li&gt;उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद, आंध्रप्रदेश। &lt;/li&gt; &lt;li&gt;स्वामी रामानंद तीरथ यूनिवर्सिटी, नांदेड, महाराष्ट्र। &lt;/li&gt; &lt;li&gt;शिवाजी विश्वविद्यालय, कोल्हापुर । &lt;/li&gt;&lt;li&gt;लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ। &lt;/li&gt; &lt;li&gt;चेन्नई विश्वविद्यालय, चेन्नई। &lt;/li&gt;&lt;li&gt;डॉ. बाबा साहेब अंबेडकर, मराठवाड़ा विश्वविद्यालय, औरंगाबाद। &lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;/p&gt;</description>
    </item>
    <item>
      <title>खनन इंजीनियरिंग के क्षेत्र में रोजगार के चमकीले अवसर</title>
      <pubDate>6/11/2010</pubDate>
      <description>&lt;p&gt;हमारी धरती के नीचे मौजूद प्रचुर खनिज संपदा हमारे जीवन का आधार है। परंतु खनिज संपदा का अनुचित एवं अवैज्ञानिक दोहन पर्यावरणीय असंतुलन की स्थितियाँ पैदा कर सकता है। इसीलिए मानवीय उपयोग के लिए इस प्राकृतिक संपदा को निकालने का काम प्रशिक्षित एवं दक्ष लोगों के नेतृत्व एवं मार्गदर्शन में किया जाता है जिन्हे खनन इंजीनियर तथा इस विधा को खनन (माइनिंग) इंजीनियरिंग कहते हैं। खनन इंजीनियरिंग के क्षेत्र में करियर बनाने के लिए विशेष प्रशिक्षण एवं कौशल की जरूरत होती है। जिन युवाओं की खनन इंजीनियरिंग के क्षेत्र में गहन रुचि हो केवल उन्हें ही इस क्षेत्र में कदम आगे बढ़ाना चाहिए क्योंकि इस क्षेत्र में काफी चुनौतियाँ हैं। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;गौरतलब है कि हमारे देश में खनिज संपदा का प्रचुर भंडार है। मध्यप्रदेश, बिहार,झारखंड, उड़ीसा व पश्चिम बंगाल आदि राज्यों से भारी मात्रा में खनिज पदार्थ प्राप्त् होते हैं। देश की अर्थव्यवस्था में खनिज संपदा का महत्वपूर्ण स्थान है। अत: देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए शिक्षित- प्रशिक्षित खनन इंजीनियरों की माँग दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। खनन इंजीनियरिंग के तहत खनिज, पेट्रोलियम तथा अन्य भूगर्भीय पदार्थ शामिल होते हैं। देश में खनन कार्यों में आई भारी तेजी के का रण यह क्षेत्र इंजीनियरिंग की एक प्रमुख शाखा बन चुका है। खनन इंजीनियरिंग के अंतर्गत धरती के भीतर खनिज पदार्थों की मौजूदगी का पता लगाना तथा सुरक्षित तरीके से उनकी खुदाई कर धरती से बाहर निका लना शामिल है। &lt;p/&gt;&lt;p&gt;खनन इंजीनियरिंग के कार्यक्षेत्र में प्रमुख रूप से उत्खनन, कच्चे खनिज पदार्थों का शुद्धिकरण आदि आते हैं। खनन इंजीनियर न केवल खनिजों से धातु और मिश्रधातु का उत्पादन करते हैं, बल्कि इस प्रक्रिया के दौरान वातावरण पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों को भी कम करने का प्रयास करते हैं। सामान्य रूप से खनन प्रक्रिया एक सूनियोजित भू-प्रायोगिक सर्वेक्षण के बाद ही प्रारंभ की जाती है। जिससे यह पता चल जाता है कि पृथ्वी के अंदर कितनी मात्रा में खनिज पदार्थ मौजूद हैं। एक तरीका यह भी है कि सर्वेक्षण के अंतर्गत चिहिन्त क्षेत्र के किसी भी भू भाग से पत्थरों को निकालकर उनका त्रिस्तरीय अध्ययन कर प्रतिशत का आकलन किया जाता है। खनिज पदार्थों की उपलब्धता ज्ञात होने पर खनन- प्रक्रिया भूमिगत अथवा उपरिगामी दो रूप में होती है। उदाहरण के तौर पर सोना, कोयला आदि भूमिगत खनन के द्वारा मिलते हैं। जबकि लौह अयस्क, चूना आदि चट्टानों को तोड़ने के लिए विस्फोट का सहारा लिया जाता है। यह विस्फोट कम अथवा तीव्र गति के सहारे उन्हीं स्थानों पर किया जाता है, जहाँ कच्चा माल मिलने की भरपूर संभावना रहती है। &lt;p/&gt;&lt;p&gt;खनन इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम में प्रवेश लेने के लिए उम्मीदवार को बारहवीं की परीक्षा भौतिक शास्त्र, रसायन शास्त्र एवं गणित विषय से उतीर्र्णहोना आवश्यक है। प्रवेश परीक्षा उतीर्र्णकरने के पश्चात ही बी.टेक.,बी.ई. (माइनिंग),बी.एससी(माइनिंग इंजीनियरिंग) में प्रवेश दिया जाता है। खनन इंजीनियरिंग के विभिन्न स्नातक पाठ्यक्रमों की अवधि तीन से पाँच वर्ष निर्धारित है। इसके बाद छात्र स्नातको र पाठ्यक्रम अर्थात एम.टेक या एम.ई. जो दो वर्ष का होता है, में प्रवेश केलिए अधिकृत हो जाते हैं। &lt;p/&gt;&lt;p&gt;खनन इंजीनियरी के स्नातक पाठ्यक्रमों में दाखिला लेने वाले उम्मीदवारों की आयु १६ से २१ वर्ष के बीच होनी चाहिए। खनन इंजीनियरिंग का पाठ्यक्रम संचालित करने वाले संस्थानों में प्रवेश परीक्षा के आधार पर ही प्रवेश दिया जाता है। इसके लिए विभिन्न संस्थान अखिल भारतीय स्तर पर लिखित परीक्षा का आयोजन करते हैं। लिखित परीक्षा मुंयत: बारहवीं स्तर के फिजिक्स, कैमिस्ट्री, मैथ्स व इंग्लिश आदि विषयों पर आधारित होती है। भारत में डीएड विश्वविद्यालय का दर्जा प्राप्त् इंडियन स्कूल ऑफ माइंस में कई तरह के कोर्स जैसे माइनिंग इंजीनियरिंग, पेट्रोलियम इंजीनियरिंग, मिनरल इंजीनियरिंग और मशीनरी माइनिंग आदि पाठ्यक्रम संचालित किए जाते हैं। इस संस्थान में प्रवेश के लिए प्रत्येक वर्ष जनवरी-फरवरी में आवेदन पत्र आमंत्रित किए जाते हैं । रोजगार की दृष्टि से खनन इंजीनियरिंग के क्षेत्र में अनुभवी व्यक्तियों की माँग सदैव बनी रहती है। सरकारी अथवा प्राइवेट दोनों ही सेँटरों में रोजगार के पर्याप्त् और उजले अवसर विद्यमान हैं। इस क्षेत्र में शिक्षण अथवा शोध की दिशा में भी कदम बढ़ाया जा सकता है। देश की अनेक प्रतिष्ठित कंपनियों जैसे टाटा आयरन एंड स्टील, रिलायंस पेट्रोलियम, इंडियन ऑयल, स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया, यूरेनियम कोर्पोरेशन ऑफ इंडिया, सरकारी खनन निगम आदि में रोजगार के चमकीले अवसर उपलब्ध हैं। प्रमुख सार्वजनिक उपक्रमों जैसे हिन्दुस्तान जिंक लिमिटेड, नेशनल मिनरल डेवलपमेंट कढॉर्पोरेशन, इंडियन ऒयूरो ऑफ माइंस लिमिटेड में खनन इंजीनियरों की भारी माँग है। इसके अलावा माइनिंग रिसर्च सेंटर, धनबाद, इंडियन एक्स्प्लोसिव लिमिटेड, इंडियन डेटोनेटर्स लिमिटेड आदि में भी रोजगार के प्रचुर अवसर हैं। खनन इंजीनियरिंग का कोर्स करने के उपरांत विदेशों में भी रोजगार के उज्ज्वल अवसर हैं। खनन क्षेत्र में खनन इंजीनियरों के वेतनमान बहुत आकर्षक होते हैं। जोखिम भरा का म होने के का रण जमीन के नीचे खदानों में काम करने वाले इंजीनियरों को धरातल पर काम करने वालों की अपेक्षा अधिक वेतन दिया जाता है। एक खनन इंजीनियर को आमतौर पर शुरूआत में २५ से ३० हजार रुपए तथा खदान के अंदर काम करने वाले को ४० से ५० हजार रुपए प्रतिमाह दिए जाते हैं। अनुभव के साथ-साथ वेतन में भी लगातार वृद्धि होती जाती है। अंत में यह कहा जाना उपयुक्त होगा कि यदि आपको चुनौतियाँ पसंद हैं और यदि आप खतरा उठाने का माद्दा रखते हैं तो आपके लिए खनन क्षेत्र में रोजगार एवं करियर की ढ़ेरों संभावनाएँ हैं। &lt;p/&gt;खनन इंजीनियरिंग का कोर्स कराने वाले देश के प्रमुख संस्थान इस प्रकार हैं-&lt;p&gt; &lt;ul&gt;&lt;li&gt;इंडियन स्कूल ऑफ माइन्स, धनबाद, झारखंड। &lt;/li&gt;&lt;li&gt;इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी। &lt;/li&gt;&lt;li&gt;बिहार इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, सिंदरी, बिहार । &lt;/li&gt;&lt;li&gt;महाराष्ट्र इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, १२४, कोथुर्ड रोड, पुणे । &lt;/li&gt;&lt;li&gt;गवर्नमेंट इंजीनियरिंग कॉलेज, रायपुर, छतीसगढ़। &lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;/p&gt;</description>
    </item>
    <item>
      <title>मर्चेंट नेवी में कॅरियर के उजले अवसर</title>
      <pubDate>6/11/2010</pubDate>
      <description>&lt;p&gt;समुद्र के सीने को चीरकर आगे बढ़ने वाले जहाजों ने हमेशा से ही हमारे मन में कौतूहल पैदा किया है। प्रारंभ में जहाँ समुद्री आवागमन एवं व्यापार छोटी नावों तक सीमित था, वही आज विशालकाय पोत में तबदील हो चुका है। समय के साथ बढ़ते नावों के आकार की तरह इन जहाजों में रोजगार के अवसर भी काफी बढ़े हैं। मर्चेंट नेवी एक ऐसा ही क्षेत्र है, जिसमें आप सुनहरे भविष्य की ओर मजबूती से कदम बढ़ा सकते हैं। मर्चेंट नेवी (व्यापारिक जहाजरानी) व्यापारिक जहाजों के जरिए सामान लाने-ले जाने वाली सेवा है। कभी-कभी इसके जरिए यात्रियों को भी लाया-ले जाया जाता है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;वर्तमान में मैरीन इंजीनियरिंग में बूम की स्थिति है। भारत के अलावा नार्वे, जापान, ग्रीस, फ्रांस, ब्रिटेन और सिंगापुर की बड़ी शिपिंग कंपनियों में हमेशा ही मैरीन इंजीनियरों की भारी माँग बनी रहती है और भारत से होने वाले व्यापार विनिमय में भारी उछाल को देखते हुए आगे भी यही स्थिति बनी रहेगी। इसे देखते हुए कोई भी व्यक्ति जो मर्चेंट नेवी से संबंधित को र्स कर चुका है, खाली नहीं बैठ सकता।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यदि आप स्वयं को आत्मविश्वास से पूर्ण, अपने दायित्वों के प्रति जागरूक तथा चुनौतियों का सामना करने में सजग व सशक्त पाते हैं तो मर्चेंट नेवी अर्थात व्यापारिक समुद्रिक विज्ञान के क्षेत्र में आपके लिए सुनहरे अवसरों की को ई कमी नहीं है क्योंकि यह एक ऐसा क्षेत्र है जो रोमांच और उत्तेजनाओं से भरा है। सचमुच मर्चेंट नेवी साहसी युवको के लिए पद, प्रतिष्ठा पैसे और उत्साह से भरपूर जीवन पाने के अवसर उप्लब्ध् कराती है। जहाज में आमतौर पर तीन मुख्य विभाग होते हैं- डेक विभाग, इंजन विभाग और सर्विस विभाग। डेक विभाग- इसमें मुख्य रूप से जहाज के कप्तान, उपकप्तान, सहायक कप्तान, चालक, पान मास्टर आदि आते हैं। जहाँ के मुखिया कप्तान का मुख्य दायित्व जहाज तथा उसके सभी कर्मचारियों व माल आदि का सुरक्षित परिवहन है। जहाज के कर्मचारियों और चालक दल पर इसका पूर्ण नियंत्रण होता है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;उपकप्तान-कप्तान के बाद जहाज का दूसरा मुख्य अधिकारी होता है। कप्तान की सहायता करने के साथ-साथ इसका मुख्य कार्य डेक कर्मचारियों, माल लादना, भंडारण आदि की गतिविधियों पर नजर रखना होता है। यह प्रशिक्षुओं व कर्मियों पर अनुशासन रखता है तथा उन्हें कार्य आवंटित करता है। सहायक कप्तान- इसका मुख्य काम फर्स्ट मेट और कप्तान को जहाज के कामकाज और नौवहन के उचित संचालन में सहयोग करना है। माल लादने और उतारने के समय मुख्य रूप से इसे रात्रि पाली की देखरेख करनी होती है। क्रढोनोमीटर, गाइरोकपास आदि जैसे मुख्य नौवहन उपकरणों की देखभाल और कर्मचारियों की शिऍट ड्यूटी का संचालन भी इसी के जिऔमे होता है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;द थर्ड मेट- इसका मुख्य कार्य सिग्नल उपकरणों, सुरक्षा और लाइफ बोट्स आदि की देखभाल करना होता है। यह इंजन तक कप्तान के आदेश भी पहुँचाता है और उन आदेशों का पालन भी करवाता है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;पायलट ऑफ शिप-&lt;/b&gt; इसकी मुख्य जिम्मेदारी आने-जाने के लिए नहर अथवा बंदरगाह आदि में पानी के अन्य जहाजों के अनुरूप स्वयं के जहाज की गति एवं दिशा तय करने जैसे कार्य करने की होती है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;सेरंग-&lt;/b&gt; यह डेक कर्मचारियों पर नियंत्रण रखता है तथा सुपरवाइजरी का कार्य करता है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;इंजन विभाग-&lt;/b&gt; इस विभाग का मुख्य उत्तरदायित्व जहाज के इंजन तथा उस पर नियंत्रण रखने वाले उपकरणों का रखरखाव करना तथा उनकी मरम्मत आदि करना होता है। इसमें मुख्य रूप से निमन् अधिकारी होते हैं-&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;शिप इंजीनियर- &lt;/b&gt;मुख्य अधिकारी होने के नाते इसे सभी इंजनों, बायलरों, इलेक्ट्रिक प्रशीतन, सेनेटरी उपकरणों, डेक मशीनरी व स्टीम कनेँशनों के सही व सहज संचालन की जिम्मेदारी निभानी होती है। यह इंजन रूम का प्रभारी होता है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;इलेक्ट्रिकल ऑफिसर- &lt;/b&gt;इंजन रूम के सभी इलेक्ट्रिकल उपकरणों को संभालने का मुख्य दायित्व इलैँट्रिकल ऑफिर का ही होता है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;रेडियो ऑफिसर-&lt;/b&gt;मैरीन रेडियों ऑफिसर के नाम से प्रसिद्ध इस पद को पाने के लिए युवा वर्ग बहुत लालायित रहता है। यह मुख्य रूप से डेक पर काम करने वालों पर नियंत्रण रखता है। इस पद के लिए वायरलेस, कम्प्यूटर तथा संदेश संप्रेषण के अन्य अत्याधुनिकतम उपकरणों, उनके संचालन, संदेश संप्रेषण आदि की जानकारी का होना भी जरूरी है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;नॉटिकल सर्वेयर- &lt;/b&gt;इसका मुख्य कार्य सागर के क्षेत्र विशेष के नँशे, चार्ट आदि तैयार करना होता है ताकि बीच समुद्र में जहाज कहीं भटक न जाए या किसी समुद्री पर्वत, टापू या चट्टान से टकरा न जाए। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;सेवा विभाग- &lt;/b&gt;जहाज की मरऔमत करने से लेकर उस पर काम करने वाले अधिकारियों व कर्मचारियों के रहने, भोजन, वस्त्र आदि की व्यवस्था का काम सेवा विभाग करता है। इसमें मुख्य स्टीवर्ड पूरे कामकाज की देखभाल करता है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;यदि आप मर्चेंट नेवी के क्षेत्र में कॅरियर बनाना चाहते हैं तो इसके दो रास्ते हैं- समुद्री इंजीनियरी में बी.एससी. की डिग्री हासिल कर या अभियांत्रिक अथवा समुद्री इंजीनियरी शाखाओं में डिग्री के उपरांत आप मर्चेंट नेवी में जा सकते हैं। भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान और गणित विषयों के साथ १२वीं परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद आप किसी जहाज में डेक कैडेट के रूप में प्रवेश ले सकते हैं। यहाँ आप तीन साल तक काम करते हुए प्रशिक्षण प्राप्त् करते हैं। नेविगेटिंग ऑफिसर या नौ संचालन अधिकारी के रूप में नियुक्ति के लिए प्रशिक्षण के बाद भूतल परिवहन मंत्रालय द्वारा ली जाने वाली दक्षता परीक्षा उत्तीर्ण करना आवश्यक होता है। इसके अलावा डिग्री पाठ्यक्रम में प्रवेश के लिए उम्मीदवारों को शारीरिक और मानसिक रूप से भी फिट होना चाहिए। नेविगेशन का प्रशिक्षण प्राप्त् करने के बाद इनकी नियुक्ति कैप्टन श्रेणी के अधिकारी के रूप में होती है। इस क्षेत्र में करियर बनाने की इच्छा रखने वालों की दृष्टि पूरी तरह सही होनी चाहिए जबकि समुद्री इंजीनियरों को प्लस-माइसन २.५ अंक तक के दृष्टि दोष को ठीक करने के लिए चश्मा पहनने की छूट है। वर्णांधता (कलर ब्लाइंडेनेस) इस व्यवसाय में अयोग्यता मानी जाती है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मर्चेंट नेवी का प्रशिक्षण देने वाली दो अग्रणी संस्थाएँ हैं- ट्रेनिंगशिप चाणँय, मुंबई जिसमें समुद्री विज्ञान (नॉटिकल साइंसेज) में ३ वर्ष का डिग्री पाठ्यक्रम उप्लब्ध् है और समुद्री इंजीनियरी अनुसंधान संस्थान, कोलकाता जहाँ समुद्री इंजीनियरी (मेरीन इंजीनियरी) में ४ साल का प्रशिक्षण दिया जाता है। इन दोनों संस्थानों के लिए उम्मीदवारों का चयन भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) की संयुक्त प्रवेश परीक्षा के आधार पर होता है। यदि आप किसी प्रायवेट संस्थान से मैरीन इंजीनियरिंग का कोर्स करना चाहते हैं तो उसे सरकार द्वारा मान्यताप्राप्त् होना चाहिए। अन्यथा आपकी ३-४ वर्षों की मेहनत एवं डिग्री प्राप्त् हेतु खर्च किया गया धन व्यर्थ चला जाएगा। मर्चेंट नेवी में वेतन व अन्य भी काफी आकर्षक हैं। समुद्री अधिकारियों के लिए शिपिंग कंपनियों में प्रतिमाह ३० से ४० हजार रुपए मिलते हैं। अनुभव के आधार पर इनका वेतनमान १ लाख रुपए तक पहुँच जाता है। इस क्षेत्र के प्रशिक्षितों के लिए विदेशी जहाजरानी कंपनियों में भी रोजगार के अच्छे अवसर उप्लब्ध् हैं। कई बहुराष्ट्रीय जहाजरानी कंपनियाँ डॉलर के रूप में वेतन देती हैं जिसकी राशि काफी अधिक होता है। &lt;/p&gt;भारत सरकार द्वारा मान्यताप्राप्त् कुछ प्रमुख संस्थान इस प्रकार हैं-&lt;p&gt; &lt;ul&gt; &lt;li&gt;एँवाटेक इंस्टीट्यूट ऑफ मेरीटाइम स्टडीज, नई दिल्ली &lt;/li&gt;&lt;li&gt;हिन्दुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड, विशाखापट्ट नम &lt;/li&gt; &lt;li&gt;को चीन पोर्ट ट्रस्ट, कोच्ची &lt;/li&gt;&lt;li&gt;इंस्टीट्यूट ऑफ मेरीटाइम स्टडी, गोआ &lt;/li&gt; &lt;li&gt;ओसेनिक मैरीन एकेडमी, देहरादून &lt;/li&gt; &lt;li&gt;चेन्नई पोर्ट ट्रस्ट, चेन्नई। &lt;/li&gt;&lt;li&gt;सीवी रमन कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग, भुवनेश्वर &lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;मर्चेंट नेवी में प्रवेश से संबंधित विस्तृत जानकारी हेतु आप जहाजरानी महानिदेशालय, जहाज भवन, बालचंद-हीराचंद मार्ग, बलार्ड एस्टेट, मुम्बई - ३३ तथा मैरीन इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट पी- १९, ताराटोला रोड, को लकाता-३८ से भी संपर्क कर सकते हैं। &lt;/p&gt;</description>
    </item>
    <item>
      <title>प्लास्टिक उद्योग में कॅरियर के चमकीले अवसर</title>
      <pubDate>6/11/2010</pubDate>
      <description>&lt;p&gt;आम आदमी की आम जरूरतों से लेकर उद्योग जगत तक में प्लास्टिक अपनी गहरी पैठ बना चुका है। घर हो या बाहर, प्लास्टिक का प्रयोग दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है। बीते एक दशक में इस उद्योग का बहुत ही तेजी से विकास हुआ है। इसी के परिणामस्वरूप इस क्षेत्र में रोजगार की संभावनाएँ भी बढ़ती जा रही हैं। प्लास्टिक के इसी बढ़ते प्रभाव को देखते हुए युवा प्लास्टिक टेक्नोलॉजी का अध्ययन कर इस क्षेत्र में चमकता हुआ कॅरियर बना सकते हैं। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;गौरतलब है कि प्लास्टिक वह पोलीमेटिक सामग्री है जिसे किसी भी रूप में ढ़ाला जा सकता है। सभी प्लास्टिक पोलीमर होते हैं। पोलीमर एक रासायनिक यौगिक होता है, जो ऐसी रासायनिक क्रिया के फलस्वरूप निर्मित होता है, जिसमें दो या अधिक छोटे अणु मिलकर ऐसे बड़े अणु बनाते हैं, जिनमें मूल अणुओं की संरचनात्मक इकाइयों का दुहराव होता है। ध्यातव्य है कि प्लास्टिक उद्योग के प्रोफेशनल्स प्लास्टिक के दानों को एँस्ट्रशन, कॉर्पोरेशन, ऒलो, ट्रांसफर, इंजेक्शन, थर्मो फार्मिंग और थर्मो सेटिंग्स जैसी प्रक्रियाओं द्वारा तैयार उत्पाद में बदलते है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;वर्तमान युग का सर्वाधिक वैविध्यपूर्ण उत्पाद प्लास्टिक है।। खिलौनों से लेकर घरेलू सामान और विभिन्न औद्योगिक घटको में प्लास्टिक का उपयोग बहुत अधिक मात्रा में किया जा रहा है।। इसके अतिरिक्त ऑटोमोबाइल्स, रेडियो और टेलीविजन सेट, मोबाइल, इलेक्ट्राक्सनिक्स, पेंट्स, सिंथेटिक टेक्सटाइल्स, एयरक्राफ्टऍट सामग्रियों, मेडिकल और सर्जिकल उपकरणों में भी प्लास्टिक का जमकर इस्तेमाल हो रहा है।। प्लास्टिक का उपयोग दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है।। आर्थिक उदारीकरण और घटती आयात ड्यूटी ने भी प्लास्टिक उद्योग का ग्राफ लगातार ऊँचा किया है।। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;भारत सरकार ने प्लास्टिक उद्योग को उच्च प्राथमिकता वाला क्षेत्र माना है। इसका कारण यह है कि अन्य प्राकृतिक संसाधनों की तुलना में बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति में प्लास्टिक एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। इसके साथ ही कृषि और जल प्रबंधन, परिवहन, भवन और निर्माण, दूरसंचार और इलेक्ट्रानिक, सुरक्षा तथा ऊर्जा निर्माण आदि में भी प्लास्टिक एक महत्वपूर्ण घटक है। प्लास्टिक का बहुतायत में पैकेजिंग, घरेलू उत्पादों, कम्युनिकेशन्स मशीन और मशीन टूल्स इंडस्ट्री में उपयोग होता है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;भारत में प्लास्टिक की माँग में प्रतिवर्ष १० से १५ प्रतिशत की वृद्धि हो रही है तथा भारत में प्लास्टिक की खपत २०१५ तक २२०० मिलियन टन हो जाने की संभावना व्यक्त की गई है।। प्लास्टिक की खपत और बढ़ती माँग से आने वाले वर्षों में प्लास्टिक सेँटर में ८५ लाख अतिरिक्त रोजगार के अवसर सृजित होंगे। सार्वजनिक क्षेत्र में प्लास्टिक इंजीनियर्स/टेक्नोलॉजिस्ट्स को पेट्रोलियम मंत्रालय, ऑयल एंड नेचुरल गैस कमीशन, ऑयल इंडिया लेबोरेटरीज, इंजीनियरिंग संयंत्रों, पेट्रोकेमिकल्स, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पेट्रोलियम, विभिन्न राज्यों में पोलीमर्स कार्पोरेशन, पेट्रोलियम कंजर्वेशन रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया, पेट्रोलियम को-ऑपरेटिव लिमिटेड आदि में कॅरियर के अच्छे अवसर हैं। इसके अतिरिक्त स्वरोजगार के क्षेत्र में भी कॅरियर की उजली संभावनाएँ हैं। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्लास्टिक इंजीनियरिंग के क्षेत्र में प्रशिक्षण देने वाला सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ प्लास्टिक इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी (सीपेट) एक स्वशासी निकाय है, जो भारत सरकार के रसायन और उर्वरक मंत्रालय के केमिकल एवं पेट्रोकेमिकल विभाग के अधीन आता है। सीपेट का मुंयालय १९६८ में चेन्नई में स्थापित किया गया था। यह संपूर्ण भारत में अपने प्रकार का पहला संस्थान है जहाँ डिजाइन, टूलिंग व प्लास्टिक की प्रोसेसिंग और टेस्टिंग की सुविधा एक ही छत के नीचे उप्लब्ध है। सीपेट देश के प्लास्टिक उद्योग की आवश्यकताओं की पूर्ति मेनपॉवर ट्रेनिंग, प्रोसेसिंग, डिजाइन, टेस्टिंग, कंसल्टेंसी, एडवायजरी और डेवलपमेंट सर्विसेज द्वारा करता है। देश की प्लास्टिक इंडस्ट्री की बढ़ती आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सीपेट ने देश के विभिन्न राज्यों में विस्तार केंद्र खोले हैं। सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ प्लास्टिक इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी की एक शाखा भोपाल के सेँटर-जी, गोविंदपुरा इंडस्ट्रियल एरिया में स्थापित है। &lt;/p&gt;सीपेट द्वारा कराए जाने वाले प्रमुख पाठ्यक्रम इस प्रकार हैं-&lt;p&gt;&lt;ul&gt; &lt;li&gt;डिप्लोमा/पोस्ट डिप्लोमा इन प्लास्टिक टेक्नोलॉजी- इस पाठ्यक्रम में प्रवेश हेतु १०वीं कक्षा गणित, विज्ञान &lt;/li&gt; &lt;li&gt;अंग्रेजी विषयों से उत्तीर्ण होना आवश्यक है। इस पाठ्यक्रम में प्रवेश हेतु अधिकतम आयु सीमा १८ वर्ष निर्धारित है।। &lt;/li&gt; &lt;li&gt;पोस्ट डिप्लोमा इन मशीन मेंटेनेंस- इस एक वर्षीय पाठ्यक्रम में प्रवेश हेतु मेकेनिकल, प्लास्टिक, केमिकल टेक्नोलॉजी, टूल, प्रोडक्शन, मेकेट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग, टूल एंड डाई मेकिंग में से किसी एक विषय में तीन वर्षीय डिप्लोमा आवश्यक है। इस पाठ्यक्रम में प्रवेश हेतु अधिकतम आयु सीमा २४ वर्ष निर्धारित है।&lt;/li&gt;&lt;li&gt;पोस्ट डिप्लोमा इन प्लास्टिक मोल्ड डिजाइन- इस एक वर्षीय पाठ्यक्रम में प्रवेश हेतु मेकेनिकल, केमिकल, ऑटोमोबाइल, मेकेट्रॉनिक्स या समकक्ष में तीन वर्षीय डिप्लोमा पाठ्यक्रम आवश्यक है। इस पाठ्यक्रम हेतु अधिकतम आयु सीमा २४ वर्ष निर्धारित है। &lt;/li&gt;&lt;li&gt;पोस्ट डिप्लोमा इन प्लास्टिक प्रोसेसिंग एंड टेस्टिंग- इस डेढ़ वर्षीय पाठ्यक्रम में प्रवेश हेतु रसायन विषय सहित स्नातक होना आवश्यक है। इस पाठ्यक्रम हेतु अधिकतम आयु सीमा २४ वर्ष निर्धारित है। &lt;/li&gt; &lt;li&gt;पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन प्लास्टिक इंजीनियरिंग- इस एक वर्षीय पाठ्यक्रम में प्रवेश हेतु बीई,बीटेक, बी.एससी या समकक्ष योग्यता आवश्यक है। इस पाठ्यक्रम हेतु अधिकतम आयु सीमा २६ वर्ष निर्धारित है। च मास्टर ऑफ टेक्नोलॉजी इन प्लास्टिक इंजीनियरिंग- इस दो वर्षीय पाठ्यक्रम में प्रवेश हेतु बीई,बीटेक, बीएससी या समकक्ष योग्यता आवश्यक है। इस पाठ्यक्रम हेतु अधिकतम आयु सीमा ३५ वर्ष निर्धारित है। सेन्ट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ प्लास्टिक इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी के विभिन्न पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए संयुक्त प्रवेश परीक्षा देनी होती है। यह प्रवेश परीक्षा सामान्यत: जुलाई माह में होती है जिसके लिए मई-जून में आवेदन देना होता है। &lt;/li&gt; &lt;li&gt;देश के अन्य संस्थानों में भी प्लास्टिक टेक्नोलॉजी के विभिन्न कोर्स उप्लब्ध हैं। बारहवीं में विज्ञान (गणित) की पृष्ठ भूमि रखने वाले छात्र प्लास्टिक टेक्नोलॉजी में बी.टेक करने की पात्रता रखते है।। प्लास्टिक टेक्नोलॉजी में एम. टेक करने के लिए केमिकल इंजीनियरिंग या प्लास्टिक रबर टेक्नोलॉजी या मैकेनिकल इंजीनियरिंग अथवा टेँक्सटाइल इंजीनियंरिंग में बी.टेक. या बीई उपाधि होना आवश्यक है।। भौतिक शास्त्र अथवा रसायन शास्त्र में एमएससी करने वाले छात्र भी प्लास्टिक टेक्नोलॉजी में एम.टेक कर सकते हैं। जिन छात्रों ने गेट परीक्षा उत्तीर्णकी हो, उन्हें एम. टेक में प्राथमिकता दी जाती है। प्लास्टिक टेक्नोलॉजी में कढॅरियर बनाने की इच्छा रखने वाले युवाओं के पास शैक्षणिक योग्यता के साथ कठोर परिश्रम, नवाचार, कल्पनाशीलता, औसत से अधिक बुद्धिमत्ता तथा भौतिकी और रसायन विज्ञान में गहरी रुचि होना बहुत आवश्यक है। &lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्लास्टिक उद्योग से संबंधित विभिन्न कोर्स कराने वाले देश के प्रमुख संस्थान इस प्रकार हैं- &lt;br /&gt; &lt;li&gt;सेन्ट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ प्लास्टिक इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी, (सीपेट), भोपाल। &lt;/li&gt;&lt;li&gt;गोविंद वल्लभपंत पोलीटेँनिक, ओखला। &lt;/li&gt;&lt;li&gt;इंडियन प्लास्टिक इंस्टीट्यूट, मुंबई। &lt;/li&gt; &lt;li&gt;निरमा इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, अहमदाबाद। &lt;/li&gt; &lt;li&gt;एसएसई कालेज ऑफ इंजीनियंरिंग एंड टेक्नोलॉजी, अकोला। &lt;/li&gt;&lt;li&gt;एमआईटी, अन्ना विश्वविद्यालय, चेन्नई। &lt;/li&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;</description>
    </item>
    <item>
      <title>रोबोटिक्स के क्षेत्र में कॅरियर के उजले अवसर</title>
      <pubDate>6/11/2010</pubDate>
      <description>&lt;p&gt;रोबोटिक्स इंजीनियरिंग कीवह शाखा है जिसके अंतर्गत रोबोट कीडिजाइनिंग, उनका अनुरक्षण, नए एप्लिकेशन का विकास और अनुसंधान जैसे काम सऔमिलित किए जाते हैं। रोबोटिक्स में मेनिपुलेशन तथा प्रोसेसिंग के लिए कम्प्यूटर का उपयोग किया जाता है। रोबोटिक्स इंजीनियरिंग शाखा में बेसिक इंजीनियरिंग के सिद्धांत तथा रोबोट्स का विकास तथा उपयोग करने के लिए तकनीकीदक्षता सिखाई जाती है। इसमें डिजाइन इंस्ट्रँक्शन, ऑपरेशन टेस्टिंग, सिस्टम मेंटेनेंस तथा रिपेयरिंग आदि शामिल हैं। गौरतलब है कि रोबोट एक ऐसी स्व नियंत्रित रि-प्रोग्रामेबल बहुउद्देशीय मशीन होती है, जिसे लोकोमोशन सहित या उसके बिना इंडस्ट्रियल ऑटोमेशन एप्लिकेशन के लिए या विभिन्न कामों के लिए सामान्यत: प्रयोग में लाया जाता है। वर्तमान में विभिन्न क्रियाकलापों में रोबोटों का उपयोग निरंतर बढ़ता ही जा रहा है इसलिए इस क्षेत्र में रोजगार के बहुत उजले अवसर विद्यमान हैं। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;रोबोटिक्स को सामान्यत: चार वर्गों में बाँटा जा सकता है। ये हैं- औद्योगिक रोबोट, पर्सनल रोबोट, मेडिकल या सर्जिकल उपयोग के लिए रोबोट तथा ऑटोनोमस रोबोट। इनमें सबसे बड़ी श्रेणी औद्योगिक रोबोटों कीहोती है, जो साधारण प्रोग्राम योग्य रोबोट होते हैं, जिनका इस्तेमाल मैन्युफैक्त चरिंग संयंत्रों में बहुतायात में होता है। उद्योगों में रोबोट्स का उपयोग निर्माण प्रक्रिया को तेज करने के लिए किया जाता है। औद्योगिक रोबोट्स द्वारा वेल्डिंग, पेंटिंग तथा मशीनों में कलपुर्जे लगाने का काम किया जाता है। रोबोट्स असेऔबलिंग, कटिंग तथा ऑटोमोबाइल्स के विभिन्न पार्ट्स को लगाने का काम भी बड़ी कुशलता एवं दक्षता से करते हैं। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;एटॉमिक, थर्मल तथा न्यूँक्लियर पॉवर स्टेशनों पर खतरनाक एवं जोखिम वाले तत्वों कीसाज-संभाल तथा मेंटेनेंस में भी इंसानों के बजाय रोबोटों का प्रयोग बढ़ा है। अब मिलिट्री ऑपरेशंस में भी रोबोट दिखाई देने लगे हैं। इन्हें न्यूँलियर साइंस, सी-एँसप्लोरेशन, इलेँट्रिकल सिग्नल्स कीट्रांसमिशन सर्विस, बायोमेडिकल इँविपमेंट कीडिजाइनिंग आदि के लिए भी उपयोग में लाया जाता है। आजकर रोबोट शल्य चिकित्सा करते हैं , बारूदी सुरंगों को हटाते हैं तथा बमों को निष्क्रिय करते हैं। जिस तरह से दिन-प्रतिदिन रोबोटों कीमाँग बढ़ती जा रही है, उसे देखते हुए रोबोटिक्स एक शानदार एवं चमकदार कॅरियर बनता जा रहा है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;रोबोटिक्स शाखा के अंतर्गत कृत्रिम बुद्धि (आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस) का भी अध्ययन किया जाता है। यह कम्प्यूटर विज्ञान कीवह शाखा है, जिसमें यह सीखा जाता है कि कम्प्यूटर में आदमी जैसी बुद्धि कैसे आए। रोबोटिक्स एक मल्टीडिसिप्लिनरी फढील्ड है, जिसमें कम्प्यूटर साइंस, न्यूरोसाइंस, मनोविज्ञान आदि विषय भी शामिल किए जाते हैं। कृत्रिम बुद्धि का उद्देश्य ऐसे कम्प्यूटर प्रोग्राम बनाना होता है, जो समस्याओं को हल कर सकें। इसमें रिसर्च कीदो मुंय धाराएँ होती हैं। एक जैविक है, जो इस विचार पर आधारित है कि आदमी सबसे बुद्धिमान होता है इसलिए आदमी का अध्ययन किया जाए और उसके मनोविज्ञान या शरीर संरचना कीरोबोट के रूप में नकल उतारी जाए। दूसरा है घटना प्रधान जो संसार के बारे में साधारण ज्ञान कीबातों के अध्ययन से संबंधित है। रोबोटिक्स विशेषज्ञ ऐसे सिस्टम विकसित करते हैं, जिनसे मशीनों से इंटरेँट किया जा सके। रोबोट तकनीक के अध्ययन के लिए इंजीनियरिंग डिग्री आवश्यक है। इस क्षेत्र में इलेँट्रॉनिँक्स, मैकेनिँक्स तथा कम्प्यूटर साइंस जैसे सहयोगी क्षेत्रों का ज्ञान शामिल होता है। इसलिए इस क्षेत्र में कॅरियर बनाने वालों को इन क्षेत्रों से संबंधित तकनीको से भी अवगत होना चाहिए। यदि आप रोबोटिक्स में डिजायनिंग तथा कंट्रोल में विशेषज्ञता प्राप्त् करना चाहते हैं तो आपको मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिग्री हासिल करनी होगी। कंट्रोल तथा हार्डवेयर में डिजायनिंग के लिए इलेँट्रिकल या इलेँट्रॉनिँक्स इंजीनियरिंग में बीटेक डिग्री लाभदायक होती है। रोबोटिक्स में कॅरियर बनाने की इच्छा रखने वाले छात्र गणित में बहुत अच्छे होने चाहिए। रोबोटिक्स के क्षेत्र में कॅरियर बनाने हेतु १२वीं कक्षा में भौतिक एवं गणित विषय होना नितांत आवश्यक है। इसके साथ ही साथ उच्चतम प्रतियोगी तथा तकनीकीक्षेत्र में आविष्कढार तथा कुछ नया करने के लिए सृजनात्मक योग्यता भी बेहद जरूरी है। रोबोटिक्स के क्षेत्र में कॅरियर बनाने वालों को सबसे पहले यह करना होगा कि वह कम्प्यूटर, आईटी, मेकेनिकल, मेकेट्रोनिँक्स, इलेँट्रॉनिँक्स अथवा इलेँट्रिकल इंजीनियरिंग में बीई या बीटेक की डिग्री प्राप्त् करें। यदि आप उच्च अध्ययन करते हैं तो इस क्षेत्र में आपके प्रवेश की संभावना और अवसर दोनों ही बढ़ जाएँगे।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;रोबोटिक्स में कोर्स करने वाले छात्र इसरो जैसे अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन में रोजगार के विशिष्ट अवसर प्राप्त् कर सकते हैं। इसके साथ ही रोबोटिक्स इंजीनियरों की माइक्रोचिप बनाने वाले उद्योगों में भी खासी माँग है। रोबोटिक्स इंजीनियरिंग में स्पेशलाइजेशन से मेनुफेक्चरिंग, कृषि, खनन, परमाणु ऊर्जा संयंत्र जैसे क्षेत्रों में कॅरियर निर्माण के दरवाजे खुल जाते हैं। वर्तमान समय में रोबोटिक्स के क्षेत्र में योग्य और गुणी प्रोफेशनल्स के सामने कॅरियर निर्माण का एक सुनहरा संसार बाहें पसारे खड़ा है। जहाँ तक इस क्षेत्र में पारिश्रमिक का प्रश्न है, इस क्षेत्र में बेहतरीन वेतन प्रदान किया जाता है। सामान्यत: आरंभिक वेतन ५० हजार से १ लाख रुपए मासिक के बीच होता है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा योग्य रोबोटिक्स प्रोफेशनल्स को बड़ा भारी वेतन एवं अन्य सुविधाएँ प्रदान कीजाती हैं। विदेशों में भी रोबोटिक्स इंजीनियरों कीभारी मांग है।&lt;/p&gt;रोबोटिक्स एवं आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से संबंधित पाठ्यक्रम संचालित करने वाले देश के प्रमुख संस्थान इस प्रकार हैं-&lt;p&gt;&lt;ul&gt; &lt;li&gt;इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (आईआईटी), दिल्ली, मुंबई, कानपुर, मद्रास, गुवाहाटी, खड़गपुर, रूड़कीआदि। &lt;/li&gt;&lt;li&gt;इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस, बंगलुरू। वेबसाइट- २२२.द्बद्बह्यष्.द्गह्मठ्ठद्गह्ल.द्बठ्ठ &lt;/li&gt;&lt;li&gt;सेंटर फॉर आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस एंड रोबोटिक्स, बंगलुरू। वेबसाइट- २२२.द्गड्डद्बह्म.ह्मद्गह्य.द्बठ्ठ &lt;/li&gt; &lt;li&gt;जादवपुर यूनिवर्सिटी, कोलकाता। वेबसाइट- २२२.द्भड्डस्रड्ड१श्चह्वह्म.द्गस्रह्व &lt;/li&gt;&lt;li&gt;बिड़ला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड साइंस (बिट्स), पिलानी।&lt;/li&gt; &lt;li&gt;कोचिन यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी, कोच्चि। &lt;/li&gt;&lt;li&gt;वीरमाता जीजाबाई टेक्नोलॉजी इंस्टीट्यूट, मुंबई। &lt;/li&gt;&lt;li&gt;थापर इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियंरिंग एंड टेक्नोलॉजी, पटियाला। &lt;/li&gt;&lt;li&gt;यूनिवर्सिटी ऑफ हैदराबाद, हैदराबाद।&lt;/li&gt; &lt;li&gt;उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद। &lt;/li&gt; &lt;li&gt;एम.एस. यूनिवर्सिटी, बड़ौदा। &lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;/p&gt;</description>
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