﻿<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?>
<rss version="2.0">
  <channel>
    <category>Biological Science</category>
    <item>
      <title>बायोइन्फरमेटिक्स के क्षेत्र में रोजगार के अवसर</title>
      <pubDate>6/11/2010</pubDate>
      <description>&lt;p&gt;जीव विज्ञान के क्षेत्र में निरंतर बढ़ रहे अनुसंधान एवं अन्य तकनीको के प्रयोग ने अब इसे संख्यात्मक विज्ञान में परिवर्तित कर दिया है। आँकड़ों को सहेजने के लिए अब जीव विज्ञान क्षेत्र में भी कम्प्यूटर एवं सूचना प्रौद्योगिकी का उपयोग बहुत बढ़ गया है। इसी कारण से बायोइन्फरमेटिक्स (जैव सूचना प्रौद्योगिकी) का उदय हुआ। बायोइन्फरमेटिक्स जीव विज्ञान से संबंधित जानकारी व आँकड़ों को व्यवस्थित करने वाली सूचना तकनीक है। बायोइन्फरमेटिक्स का सीधा-साधा अर्थ है- अनुसंधान, विकास एवं गणनात्मक साधनों का अनुप्रयोग। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;बायोइन्फरमेटिक्स एक ऐसा क्षेत्र है, जिसके माध्यम से भंडारित, संग्रहित, अभिलेखित एवं विश्लेषणात्मक आँकड़ों को किसी को उप्लब्ध् कराया जाता है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि बायोइन्फरमेटिक्स में बुनियादी अथवा मूल जीवशास्त्र के गणित, सांख्यिकी और गणनात्मक विज्ञान के समागम से बड़ी संख्या में उत्पन्न नए आँकड़ों का विश्लेषण किया जाता है। इसका उपयोग मानवीय बीमारियों के साथ-साथ जीन आधारित दवाइयों की खोज और विकास को समझने के लिए भी किया जाता है। दवा, बायोटेक, कृषि व खाद्य जैसे क्षेत्रों में बायोइन्फरमेटिक्स का उपयोग हाल के वर्षों में बहुत तेजी से बढ़ा है तथा यह क्षेत्र प्रमुख करियर विकल्प के तौर पर उभरा है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;गौरतलब है कि विज्ञान और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अधीन डिपार्टमेंट ऑफ बॉयोटेक्नोलॉजी ने बायोइन्फरमेटिक्स के माध्यम से बॉयोटेक्नोलॉजी के लिए अधोसंरचना निर्मित करने के उद्देश्य से १९८७ में बॉयोटेक्नोलॉजी इन्फरमेशन सिस्टम की स्थापना की। इस समय संपूर्ण विश्व में बीटीआईएस को बायोइन्फरमेटिक्स के क्षेत्र में अति आधुनिक अधोसंरचना, शिक्षा, मानव शक्ति तथा साधन प्रदान करने वाला प्रमुख वैज्ञानिक नेटवर्क माना जाता है। भारत दुनिया का पहला देश है, जहाँ देशभर में बायोइन्फरमेटिक्स नेटवर्क स्थापित किया गया है। डिपार्टमेंट ऑफ बॉयोटेक्नोलॉजी ने ५७ प्रमुख अनुसंधान केंद्रों को जोड़कर पूरे देश में इसके लिए एक संजाल खड़ा कर रखा है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि भारत अपनी जैव विविधता व मानव संसाधन के कारण इस क्षेत्र में बहुत प्रगति कर रहा है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;उल्लेखनीय है कि बायोइन्फरमेटिक्स ऑपरेशंस के लिए संगठित डाटाबेस की आवश्यकता होती है। इसके लिए उच्च स्तरीय हार्डवेयर एवं सॉऍटवेयर की जरूरत होती है। इसलिए इस क्षेत्र में औद्योगिक व शैक्षणिक दोनों ही क्षेत्र के विशेषज्ञों की भारी माँग है। वर्तमान में स्थिति यह है कि कंपनियों को इस क्षेत्र में कुशल पेशेवर नहीं मिल पा रहे हैं। बायोइन्फरमेटिक्स के क्षेत्र में बढ़ते अवसरों की संभावनाओं को देखते हुए पूरे देश में बायोइन्फरमेटिक्स के कोर्सों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। वर्तमान में ज्यादा से ज्यादा विश्वविद्यालय अपने पाठ्यक्रमों में बायोइन्फरमेटिक्स को सम्मिलित करते हुए दिखाई दे रहे हैं। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;जब बायोइन्फरमेटिक्स में कॅरियर बनाने की बात आती है तो इस क्षेत्र में प्रवेश पाने वालों को जीव विज्ञान का बुनियादी ज्ञान होने के साथ ही साथ कम्प्यूटर प्रणालियों तथा अवधारणाओं से पूर्णत: अवगत होना आवश्यक है। यह एक मल्टीडिसिप्लिनरी क्षेत्र है इसलिए इस क्षेत्र में सफल होने के लिए छात्र की अभिरुचियाँ बहुविषयक होनी नितांत आवश्यक है। बायोइन्फरमेटिक्स के कुछ क्षेत्रों में जीव विज्ञान के ज्ञान के बजाय न्यूमेरिकल, एल्गोरिदम तथा डाटा माइनिंग विकसित करने तथा लागू करने, कम्प्यूटर प्रोग्राम, रसायन शास्त्र तथा भौतिक शास्त्र का ज्ञान ज्यादा उपयोगी होता है। जीव विज्ञान रुचि रखने वाले सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) क्षेत्र के युवाओं के लिए भी इस क्षेत्र में करियर की अनंत संभावनाएँ हैं। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;विभिन्न संस्थानों में बायोइनफरमेटिँस के अध्ययन के लिए ग्रेजुएशन से लेकर पीएचडी तक के कोर्स उप्लब्ध् हैं। बायोइन्फरमेटिक्स के क्षेत्र में विभिन्न स्तरों पर बी.टेक, एम.टेक, मास्टर डिग्री तथा एडवांस डिप्लोमा कार्यक्रम उप्लब्ध् हैं। बायोइन्फरमेटिक्स में प्रवेश के लिए विज्ञान विषयों सहित १२वीं उत्तीर्ण होना आवश्यक है। मॉलिँयूलर बायोलॉजी, जेनेटिक्स , फार्मेसी, केमेस्ट्री, माइक्रो बायोलॉजी, फिसिक्स, मैथ्स के साथ-साथ इंजीनियरिंग,आईटी प्रोफेशनल्स भी बायोइन्फरमेटिक्स का एडवांस कोर्स कर सकते हैं। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;एक नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार बायोइन्फरमेशन का वैश्विक टर्नओवर वर्ष २०१० तक बढ़कर १५० बिलियन डॉलर हो जाएगा। इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि इस क्षेत्र में रोजगार के कितने अवसर हैं। बायोइन्फरमेटिक्स के क्षेत्र में कोर्स करने वाले उम्मीदवारों को इस समय बायोइन्फरमेटिक्स सॉऍटवेयर तथा सॉल्युशन आधारित कंपनियों तथा ड्रग डिजाइनिंग इंडस्ट्री में रोजगार के बेहतर अवसर उप्लब्ध् हैं। अन्य नियोक्तओं में बायोटेक्नोलॉजी कंपनियाँ खासकर जो पर्सनल केयर उत्पाद से जुडी हैं, उनके अलावा इंडस्ट्रीयल ऑर्गेनिज्म एवं एग्रीकल्चर क्षेत्र की कढंंपनियाँ भी शामिल हैं। बॉयोटेक्नोलॉजी से जुडे विशेष क्षेत्रों जैसे फार्मेकोजिनामिँक्स, प्रोटियोमिँक्स, फंक्शननल जिनोमिँक्स, सिँवेंस, थेपिंग एंड एनालिसिस डाटा माइनिंग एंड मैनेजमेंट में रोजगार की अपार संभावनाएँ हैं। इसके साथ ही बायोटेक्नोलॉजी, बायोमेडिकल साइंसेज, अनुसंधान आदि में भी अच्छा करियर बनाया जा सकता है। थ्रीडी स्ट्रँचर माडलिंग, कम्प्यूटेशनल केमेस्ट्री, जिनोमिँक्स आदि नए उभरते क्षेत्रों में भी चुनौतिपूर्ण रोजगार के अवसर उप्लब्ध् हैं। कई शिक्षण संस्थानों व रिसर्च कंपनियों में शिक्षक व शोध प्रशिक्षक के तौर पर भी बायोइन्फरमेटिक्स के विशेषज्ञों की भारी माँग है। विज्ञान समूह वाले छात्रों हेतु बायोइन्फरमेटिशियन, जिनेटिसिस्ट, कम्प्यूटेशनल बायोलॉजिस्ट, बायोस्टेशियन के रूप में रोजगार के चमकीले अवसर हैं जबकि कम्प्यूटर साइंस एवं सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विशिष्ट ता हासिल करने वाले छात्रों हेतु एप्लिकेशंस प्रोग्रामर, प्रोग्रामर एनालिस्ट, बायोइन्फरमेटिक्स प्रोग्रामर, ऑऒजेँट मॉड्यूलर, क्वालिटी एश्योरेस इंजीनियर, सॉऍटवेयर डेवलपमेंट इंजीनियर, एनालिस्ट, डेवलपर आदि के रूप में उजले अवसर उप्लब्ध् हैं। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;मदुरई कामराज विश्वविद्यालय, मदुरई देश का पहला विश्वविद्यालय है, जिसने पहली बार अपने स्कूल ऑफ बॉयोटेक्नोलॉजी में बायोइन्फरमेटिक्स में एडवांस डिप्लोमा पाठ्यक्रम प्रारंभ किया। वर्तमान में पुणे विश्वविद्यालय, पुणे में बायोइन्फरमेटिक्स सेंटर पर बायोइन्फरमेटिक्स में एडवांस डिप्लोमा पाठ्यक्रम संचलित किया जा रहा है। बायोइन्फरमेटिक्स इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया द्वारा बायोइन्फरमेटिक्स, बायोमेडिकल इन्फरमेटिँस, क्लिनिकल ट्रायल एंड क्लिनिक रिसर्च, फार्मा रेगुलेटरी अफेयर्स, बायोटेक्नोलॉजी में इंडस्ट्रीयल प्रोग्राम आदि के एक वर्षीय पत्राचार पाठ्यक्रम चलाए जा रहे हैं। बीआईटी विभिन्न ऑनलाइन पाठ्यक्रम भी संचालित करता है। &lt;/p&gt;जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली के बायोइन्फरमेटिक्स सेंटर पर बायोइन्फरमेटिक्स में एडवांस ग्रेजुएट डिप्लोमा पाठ्यक्रम चलाया जा रहा है। बायोइन्फरमेटिक्स के क्षेत्र में कोर्स कराने वाले कुछ अन्य प्रमुख संस्थान इस प्रकार हैं- &lt;p&gt;&lt;ul&gt; &lt;li&gt;आईआईटी, दिल्ली/खडग़पुर।&lt;/li&gt; &lt;li&gt;नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एजयूनोलॉजी, नई दिल्ली। &lt;/li&gt;&lt;li&gt;सेंटर ऑफ सेल्यूलर एंड मॉलिँयूलर बॉयोलॉजी, हैदराबाद। &lt;/li&gt;&lt;li&gt;गुरु गोविंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय, कश्मीरी गेट, दिल्ली। &lt;/li&gt;&lt;li&gt;इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस स्टडीज इन एजुकेशन यूनिवर्सिटी, राजस्थान। &lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;/p&gt;</description>
    </item>
    <item>
      <title>बायो-टेक्नोलॉजी में कॅरियर के उजले अवसर</title>
      <pubDate>6/11/2010</pubDate>
      <description>&lt;p&gt;बायो-टेक्नोलॉजी यानी जैव प्रौद्योगिकी वह तकनीक है जिसमें जीवधारियों या जीवधारियों से प्राप्त् होने वाले पदार्थों का उपयोग करके उत्पादों का निर्माण या उनमें सुधार किया जाता है। जैव प्रौद्योगिकी एक उभरता हुआ वैज्ञानिक क्षेत्र है, जिसमें असीमित संभावनाएँ हैं। चूँकि यह एक नया विज्ञान है इसलिए इसमें आने वाले समय में मनुष्य जाति के लिए लाभदायक अनुसंधान की प्रबल संभावनाएँ हैं। इसके अंतर्गत अनेक क्षेत्र सम्मिलित हैं, जैसे स्वास्थ्य और चिकित्सा, कृषि, पशुपालन, उद्योग और पर्यावरण आदि। यह संपूर्ण विश्व में उभरता हुआ क्षेत्र है, जिसमें भविष्य की उद्भुत दवाओं के आविष्कार और साथ ही पौधों तथा जीव-जन्तुओं की नई प्रजातियों के विकास का रहस्य छुपा हुआ है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;बायो-टेक्नोलॉजी के द्वारा पेड-पौधों और जीव-जन्तुओं में सुधार किया जाता है या किसी खास उद्देश्य के लिए सूक्ष्मजीवों का विकास किया जाता है। बायो-टेक्नोलॉजी के अंतर्गत समाज के लाभ के लिए औषधीय, निदानात्मक, कृषि संबंधी, पर्यावरणीय और अन्य उत्पाद तैयार करने के लिए जीवित कोशिकाओं और कोशिकाओं द्वारा उत्पादित सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है। इस सामग्री का प्रयोग इस संभावना के साथ किया जाता है कि व्यापक रूप में उपलब्ध नवीकरणीय संसाधनों से जीवन के लिए अनिवार्य पदार्थ और मिश्रण उत्पादित किए जा सकें।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यह एक परस्पर संबद्ध विज्ञान है जिसके दायरे में न केवल जीवविज्ञान शामिल है, बल्कि भौतिकशास्त्र, रसायनशास्त्र, गणित और इंजीनियरी सहित अन्य विषय भी शामिल हैं। विशेष रूप से तैयार किए गए सूक्ष्मजीव समूह का इस्तेमाल अब विभिन्न प्रकार की औषधियाँ और अन्य रसायन बनाने, खनिज धातुओं को परिष्कृत करने तथा तेल के दाग साफ करने जैसे कार्यों के लिए किया जा रहा है। बायो-टेँनोलॉजी की सहायता से अधिक पैदावार देने वाली फसलें भी तैयार की जा रही है। बायो-टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल जीव-जन्तुओं और पौधों में आनुवंशिक प्रवृत्तियॉ बदलने के लिए भी किया जा रहा है ताकि उन्हें मानव समुदाय के लिए अधिक लाभदायक बनाया जा सके। बायो-टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में नई खोजों से जीवन बचाने में सहायक स्वास्थ्य देखभाल उत्पाद और सूक्ष्म जैविक कीटनाशक बाजार में लाने में सफलता मिली है। इनसे फसलों को बीमारी और कीटाणुरोधी बनाने, ऊर्जा के अतिरिक्त संसाधन जुटाने, पर्यावरण को स्वच्छ रखने की नई तकनीक विकसित करने और ऐसी ही अन्य उपलब्घियॉ हासिल करने में भी मदद मिली है। अधिक स्वास्थ्यवर्धक भोजन उपलब्ध कराने में भी बायो-टेँनोलॉजी अत्यंत सहायक सिद्ध हो रही है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बायो-टेक्नोलॉजी से संबंधित पाठ्यक्रम में दाखिला लेने हेतु छात्र को विज्ञान का विद्यार्थी होना अवश्यक है । हालाँकि इंजीनियरी के विद्यार्थियों को भी वरीयता दी जाती है। बायो-टेँनोलॉजी के अंतर्गत चूँकि अनुसंधान शामिल है इसलिए छात्र की अनुसंधान में अभिरुचि होनी चाहिए। बायो-टेँनोलॉजिस्ट के कार्य का स्वरूप अंतरविषयी होने के कारण उन्हें जीव विज्ञान, रसायनशास्त्र, भौतिकशास्त्र या कृषि की जानकारी अवश्य होनी चाहिए। कुछ विश्वविद्यालय बायो-टेँनोलॉजी में बी.एससी. डिग्री पाठ्यक्रम संचालित करते हैं जिसमें बारहवीं कक्षा के बाद दाखिला लिया जा सकता है। आईआईटी संस्थानों में पाँच वर्षीय इंटीग्रेटड एम.टेक. पाठ्यक्रम भी उपलब्घ है जो बारहवीं (गणित) के बाद किया जा सकता है। बायो-टेँनोलॉजी में बी.एससी. करने के बाद एम.एससी. बायो-टेँनोलॉजी किया जाना अच्छे कॅरियर की दृष्टि से नितांत आवश्यक है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;स्नातकोत्तर स्तर पर छात्र कृषि बायो-टेँनोलॉजी, एनीमल बायो-टेक्नोलॉजी, इंडस्ट्रीयल बायो-टेक्नोलॉजी, एन्वायरमेंटल बायो-टेक्नोलॉजी और मरीन बायो-टेँनोलॉजी आदि विषयों में एम.एससी. या एम.टेक पाठ्यक्रम कर सकता है। देश के करीब २८ विश्वविद्यालयों में उक्त पाठ्यक्रम उपलब्ध हैं और इनमें प्रवेश जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय द्वारा संचालित संयुक्त बायो-टेक्नोलॉजी प्रवेश परीक्षा के जरिए दिया जाता है।&lt;br /&gt;बायो-टेँनोलॉजी में अनुसंधान और उद्योग दोनों ही क्षेत्रों में रोजगार के असीमित अवसर उपलब्ध हैं। इस विषय में खासकर चिकित्सा और कृषि के क्षेत्र में उत्कृष्ट संभावनाएँ हैं । चिकित्सा और स्वस्थ्य देखभाल, कृषि, पशुपालन, पर्यावरण और उद्योग आदि में अनुसंधान, उत्पादन और विपणन में रोजगार के अवसर उपलब्ध हैं। बायो-टेँनोलॉजिस्ट का कार्य अनिवार्य रूप में वैज्ञानिक और अनुसंधान उन्मुखी है। कार्य क्षेत्र के अंतर्गत मुख्य रूप से विभिन्न प्रकार के जैव संसाधित पदार्थों का उत्पादन, विभिन्न क्षेत्रों में बायो-टेक्नोलॉजी उत्पादों और प्रक्रियाओं का विपणन, अनुसंधान और जैव सूचना विज्ञान में सूचना प्रौद्योगिकी का अनुप्रयोग आदि शामिल हैं। बायो-टेक्नोलॉजी में स्नातकोत्तार उपाधि रखने वाले उम्मीदवारों के लिए औषधि एवं औषधीय अनुसंधान, सार्वजनिक प्रयोगशालाओं, रसायनों, पर्यावरण नियंत्रण, अपशिष्ट प्रबंधन, ऊर्जा, कृषि, खाद्य प्रसंस्करण और जैव प्रक्रिया उद्योगों में रोजगार के अनेक अवसर हैं। ज्यादातर बायो-टेक्नोलॉजिस्ट को अनुसंधान प्रयोगशालाओं में बड़े पैमाने पर रोजगार मिलता है। क्लिनिकल अनुसंधान व्यवसाय के अंतर्गत क्लिनिकल अनुसंधान प्रशासक, क्लिनिकल समन्वयक, क्लिनिकल प्रोग्रामर, क्लिनिकल डाटा विशेषज्ञ, औषधि कार्य समन्वयक, क्लिनिकल अनुसंधान एसोशिएट, पशु संचालक और पशु तकनीशियन आदि के रूप में नई, औषधि प्रक्रिया विकास और प्रमाणीकरण परीक्षणों के क्षेत्र में रोजगार के प्रचुर अवसर हैं। भारत में कृषि डेयरी और बागवानी जैसे अनेक संस्थान भी मौजूद हैं जो बायो-टेँनोलॉजिस्टों को रोजगार प्रदान करते हैं। डाबर, रैनबेँसी, हिन्दुस्तान लीवर, डॉँटर रेड्डीज, लैऒस और बायोकॉन आदि दवा कंपनियाँ भी योग्य बायो-टेँनोलॉजिस्टों को अनुसंधान और विकास में रोजगार प्रदान करती हैं। चूँकि बायो-टेक्नोलॉजिस्ट अपनी नई खोजों और आविष्कारों को पेटेंट करा सकते हैं, इसलिए नाम कमाने और भाग्योदय के अवसरों की भी इस क्षेत्र में कोई कमी नहीं है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;बायो-टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में रोजगार के अन्य उजले विकल्पों में विदेश जाना भी शामिल है। विकसित देशों में जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान का अग्रणी क्षेत्र है और विदेशी अनुसंधान संस्थान अपने यहाँ मोलिँयूलर बॉयोलॉजी, माइक्रोबियल जेनेटिँस, जीनथेरेपी, विषाणु विज्ञान, टिशू कल्चर, नैनो-टेँनोलॉजी, मरीन बायो-टेँनोलॉजी और ऐसे ही अन्य विषयों के विशेषज्ञों को अग्रिम अनुसंधान में एसोशिएटशिप के व्यापक अवसर प्रदान करते हैं। इस प्रकार यह क्षेत्र रोमांचक है और इसमें भारी संभावनाएँ एवं अवसर हैं। बायो-टेक्नोलॉजी उद्योग में भारी बढ़ोतरी को देखते हुए भी इस क्षेत्र में आकर्षक वेतन वाले रोजगार के असंख्य अवसर हैं। बायो-टेक्नोलॉजी में चमकीले अवसरों के लिए यह भी जरूरी है कि इसमें पोस्ट ग्रेजुशन किया जाए और वह भी स्तरीय शैक्षणिक संस्थान से। &lt;/p&gt;बायो-टेँनोलॉजी के विभिन्न पाठ्यक्रम निम्न प्रमुख विश्वविद्यालयों एवं उनसे मान्यता प्राप्त कई महाविद्यालयों में उपलब्ध हैं-&lt;p&gt;&lt;ul&gt; &lt;li&gt;जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली &lt;/li&gt; &lt;li&gt;पुणे विश्वविद्यालय, पुणे&lt;/li&gt; &lt;li&gt;विश्वभारती विश्वविद्यालय, कोलकाता&lt;/li&gt;&lt;li&gt;देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इन्दौर&lt;/li&gt; &lt;li&gt;इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद&lt;/li&gt;&lt;li&gt;गोवा विश्वविद्यालय, गोआ&lt;/li&gt; &lt;li&gt;मैसूर विश्वविद्यालय, मैसूर&lt;/li&gt; &lt;li&gt;हैदराबाद विश्वविद्यालय, हैदराबाद&lt;/li&gt; &lt;li&gt;जम्मू विश्वविद्यालय, जम्मू&lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;/p&gt;</description>
    </item>
    <item>
      <title>डेयरी टेक्नोलॉजी में कॅरियर के अवसर</title>
      <pubDate>6/11/2010</pubDate>
      <description>&lt;p&gt;भारत की कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था में डेयरी उद्योग गतिशील भूमिका निभाने वाले प्रमुख उद्योगों में से एक माना जाता है। मध्यप्रदेश जैसे कृषि प्रदेश में भी डेयरी उद्योग का विशेष महत्व है। डेयरी टेक्नोलॉजी के अंतर्गत दुग्ध उत्पादन, पशुओं की देखभाल, दुग्ध प्राप्ति और दुग्ध के विभिन्न डेयरी उत्पादों के रूप में परिवर्तन की प्रक्रिया शामिल है। उल्लेखनीय है कि करीब ५-६ सालों से दुग्ध उत्पादन में भारत का विश्व में पहला स्थान रहा है। २००८-०९ के आँकड़ों के अनुसार दूध उत्पादन का स्तर १०० मिलियन टन को पार कर गया है तथा दूध की प्रतिव्यक्ति दैनिक उप्लब्ध्ता २४५ ग्राम हो गई है। भारत वर्तमान में ७० लाख डॉलर मूल्य के दूध के बने पदार्थों का निर्यात कर रहा है। दूध की पौष्टिकता को ध्यान में रखकर इसके उत्पादन की गति को तेज करने, आधुनिक एवं परिमार्जित स्वरूप प्रदान करने के उद्देश्य से भारत में श्वेत क्रांति एवं ऑपरेशन ऍलड कार्यक्रम चलाया गया। इससे न सिर्फ देश में दूध उत्पादन बढ़ा बल्कि किसानों को भी बहुत लाभ हुआ। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;इतनी सारी उपलब्धियों के बावजूद डेयरी उद्योग के समक्ष कुछ चुनौतियाँ भी हैं। इन चुनौतियों का सामना करने के उद्देश्यों से पारंपारिपक तरीको के स्थान पर अत्याधुनिक उपकरण एवं तकनीक अपनाई जा रही है ताकि दूध की उत्पादकता एवं गुणवत्ता में वृद्धि हो सके। इतना ही नहीं दूध की खरीद, उत्पादन, रख-रखाव, गुणवत्तानियंत्रण, शीतल भंडारण, पैकेजिंग, प्रसंस्करण, मार्केटिंग एवं प्रबंधन हेतु डेयरी टेक्नोलॉजी के विशेषज्ञों की सेवाएँ ली जा रही है, जिसकी वजह से डेयरी टेक्नोलॉजी के डिग्रीधारको की माँग काफढी बढ़ गई है। डेयरी उद्योग जिसे वर्तमान समय मे भारत का स्पेशलाइज्ड क्षेत्र माना जाता है, के अंतर्गत डेयरी प्रोडँट, इनकी प्राप्ति, संचय, प्रसंस्करण और वितरण शामिल है। इसमें मुंय रोजगार उत्पादन और प्रसंस्करण के क्षेत्र में है । उत्पादन प्रक्रिया के अंतर्गत दुग्ध का संग्रह, दुग्ध उत्पादक पशुओं की देखरेख आदि माने जाते हैं। उत्पादन प्रक्रिया के सुचारू प्रबंधन के लिए डेयरी वैज्ञानिक को की सेवाएँ ली जाती हैं। ये वैज्ञानिक दुग्ध उत्पादन की मात्रा, गुणवत्ताएवं पोषक तत्वों का मूल्यांकन एवं विभिन्न प्रकार के चारे और पर्यावरण परिस्थितियों के इस पर पड़ने वाले प्रभाव का निर्धारण करते हैं। ये डेयरी उत्पादक पशुओं के प्रबंधन, प्रजनन आदि पर शोध करते हैं। प्रसंस्करण का क्षेत्र वितरण या डेयरी उत्पादों के रूपांतरण से जुडा है। दुग्ध के प्लांट तक पहुँचने के बाद प्रसंस्करण का कार्य प्रारंभ होता है। डेयरी तकनीक मुंयत: प्रसंस्करण के तकनीकी और क्वालिटी कंट्रोल पक्ष से संबंधित तकनीक उत्पाद संरक्षण तथा दुग्ध के उपयोग को विकसित करने की तकनीक से भी संबंधित मानी जाती है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;पारंपरिक तौर पर डेयरी टेक्नोलॉजी पशु चिकित्सा विज्ञान एवं पशुपालन के पाठ्यक्रम का हिस्सा था, लेकिन अब इसमें विविधता आ चुकी है और ऐसे कई संस्थान स्थापित हो चुके हैं जो डेयरी टेक्नोलॉजी के अंतर्गत डिप्लोमा, स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर के पाठ्यक्रम संचालित कर रहे हैं। कई कृषि विश्वविद्यालय बी.एससी. के स्तर पर डेयरी साइंस को एक वोकेशनल विषय के रूप में पढ़ाते हैं। डेयरी से संबंधित पाठ्यक्रमों के अंतर्गत डेयरी टेक्नोलॉजी, डेयरी इंजीनियरिंग, डेयरी केमेस्ट्री, डेयरी माइक्रोबायोलॉजी, डेयरी इकोनोमिक्स, स्टैटिस्टिक एंड मैनेजमेंट, डेयरी कैटल ब्रीडिंग एंड प्रोडँशन, डेयरी कैटल फिजियोलॉजी, डेयरी एँसटेंशन, डेयरी केटल न्यूटिशन आदि विषयों में शिक्षा एवं प्रशिक्षण दिया जाता है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;डेयरी टेक्नोलॉजी में मुंय रूप से बी.टेक., बी.एससी., एम.टेक., एम.एस.सी. स्तर के पाठ्यक्रम उप्लब्ध् हैं। जबकि कुछ संस्थानों में डिप्लोमा पाठ्यक्रम एवं पीएच.डी. करने की भी सुविधा उप्लब्ध् है। बी.टेक. (डेयरी टेक्नोलॉजी) पाठ्यक्रम की अवधि चार वर्ष निर्धारित है। एम.टेक., एम.एससी. एवं डिप्लोमा इन डेयरी इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम की अवधि दो निर्धारित वर्ष है । &lt;/p&gt;&lt;p&gt;डिप्लोमा इन डेयरी इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम में प्रवेश हेतु मैट्रिक परीक्षा गणित एवं विज्ञान विषयों सहित उत्तीर्ण होना आवश्यक है। बी.टेक. पाठ्यक्रम में प्रवेश हेतु १० + २ अथवा इंटरमीडिएट परीक्षा फिसिक्स, केमेस्ट्री तथा मैथ्स विषयों सहित उत्तीर्ण होना आवश्यक है, जबकि बी.एससी. हेतु १० + २ अथवा इंटरमीडिएट परीक्षा फिसिक्स, केमेस्ट्री तथा बायोलॉजी या एग्रीकल्चर समूह से उत्तीर्ण होना आवश्यक है। एम.टेक. पाठ्यक्रम में बी.टेक. उत्तीर्ण छात्र प्रवेश ले सकते हैं। एम.एससी. पाठ्यक्रम में प्रवेश हेतु बी.एससी. (डेयरी टेक्नोलॉजी/ फूड़ टेक्नोलॉजी/ बायोटेक्नोलॉजी) उत्तीर्ण अभ्यार्थी आवेदन कर सकते हैं। पीएचडी करने हेतु डेयरी टेक्नोलॉजी से संबंधित स्नातकोत्तर स्तर की डिग्री होना आवश्यक है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इन पाठ्यक्रमों में प्रवेश हेतु विभिन्न संस्थान एवं विश्वविद्यालय नियमानुसार प्रवेश परीक्षा आयोजित करते हैं, जबकि नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीट्यूट की सभी सीटें एवं विभिन्न राज्यों के डेयरी टेक्नोलॉजी से संबंधित संस्थान में स्नातक स्तर के पाठ्यक्रमों में १५ प्रतिशत सीटें और स्नातकोत्तर स्तर के पाठ्यक्रमों में २५ प्रतिशत सीटें भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा आयोजित अखिल भारतीय संयुक्त प्रवेश परीक्षा के माध्यम से भरी जाती हैं। डेयरी टेक्नोलॉजी में कॅरियर बनाने के इच्छुक उम्मीदवारों के पास वैज्ञानिक मनोवृत्ति, कठिन परिश्रम, प्रतिबद्धता की प्रवृत्ति का होना आवश्यक है। पर्याप्त् सुविधाओं से दूर क्षेत्रों में भी रहने की उनकी मानसिकता होनी चाहिए। डेयरी टेक्नोलॉजी एक चुनौतीपूर्ण कॅरियर प्रदान करता है जो प्रशिक्षित प्रोफेशनल को भरपूर संभावनाएँ प्रदान करता है। वर्तमान में भारत में करीब ४०० से अधिक डेयरी प्लांट हैं और कई डेयरी उपकरण निर्माता कंपनियाँ हैं। डेयरी टेक्नोलॉजिस्ट के लिए निजी और सार्वजनिक दोनों ही क्षेत्रों में नौकरी के उजले अवसर विद्यमान हैं। डेयरी टेक्नोलॉजी का पाठ्यक्रम करने वालों को डेयरी फर्म, डेयरी को-ऑपरेटिव, दुग्ध उत्पादन प्रक्रिया आदि में रोजगार मिल जाता है। क्वालिटी कंट्रोल विभाग भी डेयरी टेँनोलॉजिस्ट की भर्ती करते हैं। कई डेयरी टेक्नोलॉजिस्ट अपने स्वतंत्र व्यवसाय जैसे लघु स्तरीय मिल्क प्लांट, क्रीम-आइसक्रीम प्लांट आदि को स्थापित कर सकते हैं और कई कंसल्टेंट के रूप में भी कार्य कर सकते हैं। इस क्षेत्र में शिक्षण, शोध और विकास की भी व्यापक संभावनाएँ हैं। नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड, विभिन्न राज्यों के डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड, कृषि विश्वविद्यालयों के शिक्षण एवं अनुसंधान संगठन, फूड एवं कन्फेढँशनरी इंडस्ट्री, बैंक एवं बीमा कंपनियों, नाबार्ड के अलावा राज्यों के डेयरी सहकारी परिसंघों में नियोजित हुआ जा सकता है। चॉकलेट, आइसक्रीम आदि बनाने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ डेयरी टेक्नोलॉजी के विशेषज्ञों को उच्च वेतनमान पर नियुक्ति करती हैं।&lt;/p&gt; डेयरी टेक्नोलॉजी का पाठ्यक्रम संचालित करने वाले प्रमुख संस्थान इस प्रकार हैं-&lt;p&gt;&lt;ul&gt; &lt;li&gt;मध्यप्रदेश के विभिन्न कृषि महाविद्यालयों में बी.एससी. पाठ्यक्रम के अंतर्गत एक विषय के रूप में डेयरी टेक्नोलॉजी के अध्ययन की सुविधा उप्लब्ध् है।&lt;/li&gt;&lt;li&gt;वेटेनरी कालेज, बेंगलूर, कर्नाटक। &lt;/li&gt; &lt;li&gt;गुजरात एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी, बांसकाठा। &lt;/li&gt;&lt;li&gt;सेठ एमसी कालेज ऑफ डेयरी साइंस , आणंद, गुजरात-३८८११०१। &lt;/li&gt;&lt;li&gt;संजय गाँधी इंस्टीट्यूट ऑफ डेयरी टेक्नोलॉजी, जगदेव पथ, बेली रोड, पटना, बिहार-८०००१४। &lt;/li&gt;&lt;li&gt;कालेज ऑफ फूड एंड डेयरी टेक्नोलॉजी, इलाहाबाद एग्रीकल्चर इंस्टीट्यूट, इलाहाबाद-२११००७१। । &lt;/li&gt; &lt;li&gt;महाराणा प्रताप यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चर एंड टेक्नोलॉजी, उदयपुर, राजस्थान-३१३००१। &lt;/li&gt;&lt;li&gt;कालेज ऑफ डेयरी टेक्नोलॉजी, इंदिरा गाँधी कृषि विश्वविद्यालय, कृषक नगर, रायपुर-४९२०१२। &lt;/li&gt;&lt;li&gt;नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीट्यूट, करनाल, हरियाणा, १३२००१। &lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;/p&gt;</description>
    </item>
    <item>
      <title>डाइटीशियन के रूप में करियर के उजले अवसर</title>
      <pubDate>6/11/2010</pubDate>
      <description>&lt;p&gt;संतुलिन और उचित आहार हमारे शरीर के भीतर ऊर्जा का संचार करता है। हमें अपने शरीर के अनुपात के अनुसार कितने पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है और कौनसे खाद्य पदार्थ सेहत को नुकसान पहुँचा सकते हैं, अगर आपकी रुचि इन प्रश्नों का उत्तर जानने में है तो डायटीशियन के पेशे को अपनाकर आप अपना ही नहीं, दूसरों की सेहत का भी खयाल रख सकते हैं। हालांकि हमारे देश में अभी भी इस जरूरत के प्रति आम लोगों में बहुत ज्यादा जागरूकता नहीं है, फिर भी सेलेब्रिटी व युवा वर्ग का फी सचेत होता जा रहा है। वह डाइटीशियन के अनुसार बनाए गए डाइट प्लान के हिसाब से खाने-पीने में रुचि दिखा रहा है। यही का रण है कि आज इसे करियर के रूप में अपनाने के प्रति लोगों की रुचि जाग्रत हुई है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गौरतलब है कि एक डाइटीशियन को संबंधित व्यक्ति की जीवन शैली, खाने की आदतों, सामाजिक स्तर, आयु और पाचन तंत्र की कार्यक्षमता के आधार पर आहार की सूची बनानी पड़ती है। एक डाइटीशियन के रूप में आप नवजात शिशु से लेकर वृद्ध, बीमार और खिलाडियों तक की डाइट का चार्ट बना सकते हैं। डाइटीशियन लोगों को सलाह देता है कि स्वस्थ रहने के लिए उसे किस तरह का भोजन करना चाहिए। डायटीशियन का का र्य जितना आसान दिखाई देता है वास्तव में वह उतना आसान नहीं है, क्योंकि रोगियों के लिए व्यक्तिगत आहार योजना बनाते हुए विभिन्न क्लिनिकल घटको को ध्यान में रखना होता है, साथ ही रोगियों की जीवनशैली, खान-पान की आदतों, सामाजिक संगठन, चयापचय आदि पर भी विचार करना होता है। डाइटीशियन का तीन वर्षीय एप्लाइड डिग्री पाठ्यक्रम करने हेतु जीव विज्ञान/गृह विज्ञान विषयों के साथ बारहवीं कक्षा उतीर्र्ण होना आवश्यक है। जबकि स्नानतको द्वारा पाठ्यक्रम में प्रवेश लेने के लिए गृह विज्ञान, सूक्ष्म जीव विज्ञान, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान, डाइटेटिँस या औषधि विज्ञान में स्नातक होना आवश्यक है। गृह विज्ञान में बीए व सूक्ष्म जैविकी में बीएससी के पाठ्यक्रम में डाइटेटिँस को एक विषय के रूप में पढ़ाया जाता है, जबकि एमएससी में इसे विशेषज्ञता के रूप में पढ़ाया जाता है। कुछ संस्थानों में डाइटीशियन के डिप्लोमा एवं प्रमाण पत्र पाठ्यक्रम भी उपलब्ध हैं । &lt;/p&gt;&lt;p&gt;डाइटीशियन के स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर के पाठ्यक्रमों में भोजन, विज्ञान, जैव रसायन, शरीर विज्ञान, जैव सांंयिकी , शोध पद्धति और सूक्ष्म भोजन जैविकी आदि विषय शामिल होते हैं। पाठ्यक्रम पूरा होने के बाद अनुभव प्राप्त् करने के लिए आप किसी अस्पताल में इंटर्नशिप कर सकते हैं या किसी डाइटीशियन के अधीन भी काम कर सकते हैं। अगर आप स्वतंत्र रूप से प्रैँटिस करना चाहते हैं तो इसके लिए आपको रजिस्टर्ड डाइटीशियन की परीक्षा उतीर्र्ण करनी होती है। शैक्षिक योग्यता के साथ-साथ इस पेशे में एक वैज्ञानिक नजरिए की भी बड़ी जरूरत होती है। स्वास्थ्य व पोषण संबंधी विषयों की जानकारी होने के साथ व्यवहार कुशलता भी अनिवार्य है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;वर्तमान में डाइटीशियन के पेशे में अपार संभावनाएँ हैं, क्योंकि लोग अपनी सेहत को लेकर बहुत सजग हो रहे हैं। युवतियों के लिए यह एक बेहतरीन करियर विकल्प है क्योंकि आय के साथ-साथ उन्हे अपने परिवार के साथ भी समय बिताने का मौका मिल जाता है। किसी समय में यह महिलाओं एवं युवतियों का ही कार्यक्षेत्र माना जाता था लेकिन अब पुरुष भी इस करियर में बहुत दिलचस्पी दिखा रहे हैं। इस का म को लेकर संतुष्टि का स्तर भी काफी बढ़ गया है। इन दिनों फिटनेस सेंटर, हेल्थ क्लबों और स्पा के प्रति सभी वर्गों का रुझान बढ़ा है। इन सेंटरों पर डाइटीशियन व्यक्तिगत स्वास्थ्य का तथा फिटनेस स्तर को बनाए रखने के लिए डाइट अर्थात आहार संबंधी परामर्श देने के लिए नियुक्त किए जाते हैं। सितारा होटलों में भी डायटीशियनों की सेवाएँ ली जाती हैं। यहाँ ये शेफ की मदद से ग्राहको के लिए संतुलित आहार चार्ट तैयार करते हैं। वे यह सुनिश्चित करने में भी मदद करते हैं कि ग्राहको को परोसा जा रहा भोजन न केवल खाने लायक हो बल्कि पौष्टिक भी हो। वर्तमान समय में डिब्बाबंद और रेडी टू इट खाद्य पदार्थों का भी भारी चलन है। पिज्जा हट और जंक फूड के पार्लर सारे देश में छाए हुए हैं। यहाँ दाम की प्रतिस्पर्धा के साथ ही ग्राहको को अच्छी गुणवत्ता और उचित कैलोरी आहार देने के दावे किए जाते हैं। इन सभी क्षेत्रों में डाइटीशियनों के लिए बहुत अच्छी संभावनाएँ हैं। इसके अलावा सामान्य जन को संतुलित आहार लेने और कुपोषण से बचने की सलाह देने वाली सरकारी और गैर सरकारी एजेंसियों के दरवाजे भी डाइटीशियनों के लिए खुले हैं। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;अस्पतालों और क्लिनिको के अलावा डाइटीशियन रक्षा प्रतिष्ठानों, शिक्षण संस्थानों, होस्टल और कंपनियों या फैक्टरीयों में चलने वाली बड़ी-बड़ी कैंटीनों में काम कर सकते हैं। वहाँ उन्हें दिए गए एक निश्चित बजट के भीतर स्वादिष्ट, पौष्टिक व संतुलित भोजन कैसे बन सकता है, इसकी जानकारी प्रदान करनी होती है। फिटनेस सेंटर जहाँ खिलाड़ी, मॉडल या फिट रहने के इच्छुक लोग जाते हैं, वहाँ भी डायटीशियनों की बहुत जरूरत होती है। इस पेशे से जु़डा एक अन्य विकल्प शोध करना भी है। संयुँत राष्ट्र, यूनिसेफ और विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों के अलावा मानव संसाधन विका स मंत्रालय के अधीन आने वाले संगठन तथा राष्ट्रीय पोषण विज्ञान संस्थान भी इनकी सेवाएँ लेते हैं। बतौर शिक्षक भी कार्य किया जा सकता है। बड़े पैमाने पर डिब्बाबंद भोज्य पदार्थों का उत्पादन और प्रोसेसिंग करने वाले उद्योगों में भी डायटीशियन को रखा जाता है। एक फ्रीलांसर या लेखक के तौर पर भी रोजगार अर्जित किया जा सकता है। अगर आप में लिखने की प्रतिभा है तो आप इस विषय पर पुस्तकें लिख सकते हैं, किसी अखबार में कालम लिख सकते हैं या पौष्टिकता से भरपूर पकवानों के बारे में इलेँट्रॉनिक मीडिया पर जानका री दे सकते हैं।&lt;/p&gt;वर्तमान समय में डाइटीशियनों को बहुत अच्छा वेतन मिल रहा है। किसी हैल्थँक्लब या स्पा सेंटर पर पार्ट टाइम काम कर प्रतिमाह १० से २५ हजार रुपए तक अर्जित किए जा सकते हैं। बड़े अस्पतालों तथा नर्सिंग होम में भी २५ हजार रुपए मासिक से शुरुआत होती है। यदि आप अपना स्वयं का व्यवसाय प्रारंभ करते हैं तो मनचाहा पारिश्रमिक प्राप्त् किया जा सकता है। डाइटीशियन का कोर्स कराने वाले प्रमुख संस्थान इस प्रकार हैं-&lt;p&gt; &lt;ul&gt;&lt;li&gt;इंस्टिट्यूट ऑफ केटरिंग टेक्नोलॉजी एंड एप्लाइड न्यूट्रीशियनिस्ट, शिवाजी पार्क दादर, मुंबई/नई दिल्ली/चेन्नई/कोलकाता। &lt;/li&gt;&lt;li&gt;भोज मुक्त विश्वविद्यालय, भोपाल (सर्टिफिकेट कोर्स)। &lt;/li&gt;&lt;li&gt;इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, नई दिल्ली। &lt;/li&gt;&lt;li&gt;महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, अजमेर। &lt;/li&gt;&lt;li&gt;डॉ. बी. आर. अऔबेडकर, विश्वविद्यालय, आगरा। &lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;/p&gt;</description>
    </item>
    <item>
      <title>फूड टेक्नोलॉजी में कॅरियर</title>
      <pubDate>6/11/2010</pubDate>
      <description>&lt;p&gt;वर्तमान के आपाधापी वाले जीवन में समय के अभाव एवं भोजन की बदलती हुई आदतों के कारण डिब्बाबंद प्रसंस्कृत भोजन एवं पेय पदार्थों का प्रचलन हमारे देश में दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है । वर्तमान में भोजन की समग्र अवधारणा ही पूर्णत: बदल गई है । कृषि पर आधारित फूड टेक्नोलॉजी (खाद्य प्रौद्योगिकी) ने रोजगार एवं कॅरियर के काफी अच्छे एवं उजले अवसर खोल दिए हैं । इस क्षेत्र में प्रतिवर्ष लगभग ढ़ाई लाख से अधिक रोजगार के नए अवसर सृजित हो रहे हैं । दिन-प्रतिदिन आबादी विद्युत गति से बढ़ती जा रही है तथा खेती की भूमि निरंतर कम होती जा रही है । इससे उत्पादन एवं उपभोग के बीच अंतर बढ़ता ही जा रहा है । इस अंतर को फूड टेक्नोलॉजी एवं प्रोसेसिंग का इस्तेमाल कर कम किया जा सकता है । फूड टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर बहुत बड़ी मात्रा में खाद्य सामग्री की प्रोसेसिंग कर उन्हें खराब होने से बचाया जा सकता है तथा बेहतर गुणवत्ता और पोषक तत्वों से युक्त भोज्य सामग्री बाजार में उपभोग हेतु उपलब्ध कराई जा सकती है । इससे रोजगार के अवसरों में भी भारी वृद्धि होगी । विकसित देशों की तुलना में भारत में फूड टेक्नोलॉजी एवं प्रोसेसिंग उद्योग तुलनात्मक रूप से पिछड़ा हुआ है । यूँ तो हमारे देश में फूड टेक्नोलॉजी एवं प्रोसेसिंग उद्योग सदियों पुराना है । प्राचीनकाल से ही महिलाएँ घरों में अचार-मुरब्बा,अमचूर आदि का निर्माण करती रही हैं परंतु यह अभी भी कुटीर उद्योग ही है । परंतु अब धीरे-धीरे विश्व के साथ कदमताल करते हुए आधुनिक तकनीक वाली फूड टेक्नोलॉजी एवं प्रोसेसिंग इकाइयाँ हमारे देश में लगाई जा रही हैं । इन इकाइयों से उत्पादित उत्पादों की गुणवत्ता विश्व कोटि की होती है । &lt;/p&gt;&lt;p&gt;मूल्य संवर्धित वनस्पतियों, सब्जियों , फलों, मवेशी उत्पादों के प्रसंस्कृत स्वरूप के निर्यात की भारत में बहुत संभावनाएँ हैं। डेयरी उत्पाद, मांस, पोल्ट्री उत्पाद तथा समुद्री उत्पादों की भी विदेशों में बहुत भारी माँग है। दुग्ध उत्पादन में तो भारत का विश्व में प्रथम स्थान है। सऒजियों के उत्पादन में भी भारत का विश्व में पहला और फलों के उत्पादन में दूसरा स्थान है। विश्व के आम उत्पादन का पचास प्रतिशत भारत में होता है । यदि फूड टेक्नोलॉजी एवं प्रोसेसिंग का समुचित प्रयोग किया जाए तो भारत इस क्षेत्र में विश्व का सिरमौर बनने की क्षमता रखता है । &lt;/p&gt;&lt;p&gt;किसी भी फूड टेक्नोलॉजी कार्यक्रम की सफलता के लिए प्रशिक्षित फूड टेँक्नोलॉजिस्ट का होना बेहद जरूरी है । फूड टेँक्नोलॉजिस्ट समुचित टेँक्नोलॉजियों का इस्तेमाल करके कम लागत पर उच्च गुणवत्तायुक्त उत्पाद तैयार करते हैं । फूड टेँक्नोलॉजिस्ट् को उत्पादन, गुणवत्ता नियंत्रण, विपणन और खरीद जैसे भिन्न-भिन्न कार्य करने होते हैं । भारत में प्रतिवर्ष बड़ी भारी संख्या में अंतरराष्ट्रीय स्तर के फूड टेँनोलॉजिस्ट् तैयार हो रहे हैं । सीएफटीआरआई, मैसूर खाद्य अनुसंधान और शिक्षा के क्षेत्र में देश में अग्रणी संस्थान है । देश के प्रमुख कृषि विश्वविद्यालयों एवं सामान्य विश्वविद्यालयों द्वारा भी खाद्य उद्योग की जरूरतें पूरी करने के लिए बी.टैक./बी.एससी./एम. टैक./एम.एससी. और पीएच.डी. फूड टेक्नोलॉजी पाठ्यक्रम संचलित किए जा रहे हैं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;विभिन्न विश्वविद्यालयों द्वारा फूड टेक्नोलॉजी पाठ्यक्रमों में प्रवेश, प्रवेश परीक्षा के आधार पर प्रदान किया जाता है । सीएफटीआरआई, मैसूर अपनी स्वयं की प्रवेश परीक्षा का आयोजन करता है । राज्यों के कृषि विश्वविद्यालयों में स्नातकोत्तर उपाधि की पच्चीस प्रतिशत सीटें अखिल भारतीय प्रवेश परीक्षा के आधार पर भरी जाती हैं । बी.टैक/बी.एससी. पाठ्यक्रम में प्रवेश हेतु विज्ञान (फिजिँक्स, केमेस्ट्री, मैथ्स/बॉयोलॉजी) में बारहवीं परीक्षा उत्तीर्ण होना जरूरी है एम. टैक. पाठ्यक्रम के लिए खाद्य प्रौद्योगिकी/कृषि/रसायन इंजीनियरी में बी.टैक. तथा एम. एससी. फूड टेक्नोलॉजी के लिए फिजिँक्स, केमेस्ट्री, मैथ्स/लाइफ साइंस में बी.एससी./कृषि/फूड टेक्नोलॉजी में बी.एससी. परीक्षा उत्तीर्ण होनी चाहिए ।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;फूड टेक्नोलॉजिस्टों हेतु करियर की काफी उजली संभावनाएँ व्याप्त हैं । फूड टेक्नोलॉजिस्टों को विभिन्न संगठनों में अच्छा रोजगार दिया जाता है । इनमें सरकारी, सहकारी तथा विभिन्न बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ शामिल हैं। फूड टेक्नोलॉजिस्टों को बीआईएस-एग्मार्क इंस्पेँकटरों, खाद्य इंस्पेँकटर, आदि के रूप में भी नियुक्त किया जा रहा है । प्राइवेट और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों में रोजगार की व्यापक संभावनाएँ हैं । विनिर्माण घरानों से लेकर विपणन घरानों तक में फूड टेक्नोलॉजिस्टों हेतु रोजगार की ढेरों संभावनाएँ हैं।&lt;/p&gt;फूड टेक्नोलॉजी से संबंधित प्रमुख पाठ्यक्रम एवं उन्हें संचालित करने वाले प्रमुख संस्थान इस प्रकार हैं-&lt;p&gt; &lt;ul&gt; &lt;li&gt;शहीद राजगुरु कॉलेज ऑफ एप्लाइड साइंस फढॉर वूमैन, दिल्ली- यहाँ फूड टेक्नोलॉजी में बी.एससी. पाठ्यक्रम उपलब्ध है । &lt;/li&gt; &lt;li&gt;सीएफटीआरआई, मैसूर (कर्नाटक)- इस संस्थान में एम.एससी. फूड टेक्नोलॉजी और पीएच.डी. पाठ्यक्रम उपलब्ध है ।&lt;/li&gt; &lt;li&gt;जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर- यहाँ एम.एससी. फूड टेक्नोलॉजी पाठ्यक्रम उपलब्ध है । &lt;/li&gt; &lt;li&gt;आई.आई.टी. खड़गपुर, पश्चिम बंगाल- यहाँ फूड टेक्नोलॉजी में एम.टैक. तथा पीएचडी पाठ्यक्रम उपलब्ध है ।&lt;/li&gt; &lt;li&gt;सीसीएसएचयूए, हिसार, हरियाणा- यहाँ एम.एससी. फूड टेक्नोलॉजी पाठ्यक्रम उपलब्ध है । &lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;/p&gt;</description>
    </item>
  </channel>
</rss>
